वाराणसी एयर शो बना आकर्षण का केंद्र, विमान देखने के लिए पैदल पहुंचीं 16 महिलाएं

वाराणसी। रोजमर्रा की घरेलू जिम्मेदारियों और घर की चारदीवारी से निकलकर आसमान में गूँजती लड़ाकू विमानों की गर्जना देखने का एक अनोखा और यादगार मौका वाराणसी में देखने को मिला। दुलहीपुर क्षेत्र की सोलह मुस्लिम महिलाओं ने अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या से समय निकालकर एयर शो देखने की अनोखी मिसाल पेश की। घर से लगभग पाँच किलोमीटर का पैदल सफर तय कर यह महिलाएँ गंगा किनारे बहादुरपुर घाट पहुँचीं। सुबह-सुबह तय की गई दूरी और पैदल चलने की थकावट पर उनका उत्साह पूरी तरह भारी नजर आया, जब उन्होंने पहली बार इतने करीब से आसमान में लड़ाकू विमानों को कलाबाजियाँ खाते देखा।
प्रधानमंत्री की पहल से मिला ऐतिहासिक अवसर
गंगा तट पर मौजूद महिलाओं ने खुशी जताते हुए कहा कि देश के शीर्ष नेतृत्व की पहल के कारण काशी की धरती पर इस प्रकार का भव्य एयर शो संभव हो पाया है। उनका कहना था कि यदि ऐसा विशाल आयोजन उनके अपने शहर में आयोजित न किया जाता तो शायद पूरा जीवन व्यतीत हो जाता, परंतु उन्हें इतने करीब से वायुसेना के लड़ाकू जहाजों को उड़ते हुए देखने का अवसर कभी न मिल पाता। महिलाओं के अनुसार यह महज एक हवाई प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उनके लिए अपने दैनिक जीवन से बाहर निकलकर एक ऐसे अदभुत और कभी न भूलने वाले अहसास का हिस्सा बनने का अवसर था।
छत पर रिहर्सल देखने के बाद घाट तक पहुँचने का सफर
क्षेत्र की निवासी शबाना और साजिया ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि पिछले कुछ दिनों से जब भी लड़ाकू विमानों की आवाज गूँजती थी, तो वे घर की छतों पर जाकर अभ्यास देखा करती थीं। हालाँकि दूर से विमानों को देखने के बाद उनके मन में इस नजारे को और अधिक करीब से देखने की उत्सुकता जाग उठी, जिसके बाद शनिवार को वे परिवार की अन्य महिलाओं के साथ सीधे गंगा तट पर पहुँच गईं। उन्होंने कहा कि आमतौर पर ऐसे बड़े और तकनीकी प्रदर्शन बड़े महानगरों में ही आयोजित होते हैं, ऐसे में अपने ही क्षेत्र में बिना किसी दूसरे शहर की यात्रा किए यह रोमांच देखने को मिलना उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा है।
घर की सीमाओं से बाहर निकलकर हासिल किया नया अनुभव
स्थानीय छात्रा फातिमा और रूबिका ने कहा कि अधिकांश महिलाओं का जीवन घर के भीतर ही सिमट कर रह जाता है। यदि यह आयोजन देश के किसी सुदूर हिस्से में होता तो उनके लिए वहाँ जाना और इस प्रदर्शन का साक्षी बनना व्यावहारिक रूप से मुमकिन नहीं था। गंगा किनारे पहुँचकर जब उन्होंने वायुसेना के विमानों की गर्जना सुनी और उनकी उड़ान देखी, तो उनका चेहरा गर्व और आनंद से खिल उठा। उनके लिए यह सफर सिर्फ पाँच किलोमीटर की दूरी तय करना भर नहीं था, बल्कि अपनी रोजमर्रा की सीमा रेखाओं से बाहर आकर एक बेहद खास और यादगार दिन का आनंद लेने का खूबसूरत माध्यम बन गया।
