एक पोस्ट और वीरता की दो कहानियां, पीएम मोदी ने याद दिलाया सीआरपीएफ का गौरवशाली इतिहास

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से देश के प्रमुख केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' के जवानों की अदम्य वीरता और उनके ऐतिहासिक पराक्रम की मुक्तकंठ से सराहना की गई है। बल के इतिहास में यह एक अत्यंत गौरवशाली अवसर दर्ज किया गया है, जिसके तहत पिछले एक वर्ष के लंबे अंतराल में आतंकवाद और उग्रवाद विरोधी अभियानों के दौरान एक भी जवान की ऑपरेशनल शहादत नहीं हुई है। सीआरपीएफ के संगठित इतिहास में करीब 47 वर्षों के पश्चात इस दुर्लभ उपलब्धि को पुनः दोहराया गया है, जिससे पूरे बल और देश का मस्तक गर्व से ऊंचा हो गया है। इस ऐतिहासिक मुकाम को हासिल करने के पीछे अनगिनत वीर जवानों और साहसी अधिकारियों का अथक परिश्रम, उनकी अटूट प्रतिबद्धता तथा कई सूरमाओं का सर्वोच्च बलिदान शामिल है, जिन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा के खातिर अपने प्राणों की आहुति तक दे दी।

शहीद नितिन पी भालेराव का अदम्य साहस और मिनपा अभियान

छत्तीसगढ़ के अति नक्सल प्रभावित सुकमा जिले के मिनपा क्षेत्र में सुरक्षा बलों के लिए एक स्थायी कैंप स्थापित करना भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य था। इस दुर्गम इलाके में पूर्व में हुई भीषण मुठभेड़ के दौरान सुरक्षा बलों को भारी क्षति उठानी पड़ी थी, जिसके बाद सीआरपीएफ की विशेष कोबरा इकाई को इस सामरिक दृष्टि से संवेदनशील गढ़ में फतह हासिल करने का जिम्मा सौंपा गया। नवंबर 2020 के दौरान जब 206वीं कोबरा बटालियन के साहसी सहायक कमांडेंट नितिन पी भालेराव अपने वीर साथियों के साथ इस अभियान पर आगे बढ़ रहे थे, तो नक्सलियों ने बड़ी तादाद में बारूदी सुरंगों (आईईडी) का जाल बिछा रखा था।

अचानक हुए भीषण विस्फोट में कमांडेंट नितिन भालेराव और उनके कई साथी गंभीर रूप से जख्मी हो गए, किंतु इसके बावजूद इन जांबाज सैनिकों ने अपने हथियार नहीं छोड़े और लहूलुहान अवस्था में भी नक्सलियों की अंधाधुंध गोलीबारी का मुँहतोड़ जवाब देते हुए उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इस भयंकर संघर्ष में गंभीर रूप से घायल हुए नितिन भालेराव ने अंततः उपचार के दौरान अपनी अंतिम सांस ली, लेकिन उनके अंदुरुनी शौर्य ने इतिहास के पन्नों में अमरता प्राप्त कर ली।

पीआर मिश्रा के नेतृत्व में नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक प्रहार

सीआरपीएफ के भीतर अपने अद्वितीय नेतृत्व कौशल और असीमित साहस के लिए पहचाने जाने वाले अधिकारी पीआर मिश्रा का नाम एक समय में खूंखार नक्सलियों के दिलों में खौफ पैदा करने के लिएपर्याप्त था। अपने सेवाकाल के दो लंबे दशक अत्यंत कठिन नक्सल विरोधी अभियानों में समर्पित करने वाले इस अधिकारी के नेतृत्व में सौ से अधिक सफल मुठभेड़ों को अंजाम दिया गया, जिसमें लगभग पाँच सौ कुख्यात उग्रवादियों को या तो मार गिराया गया या सलाखों के पीछे पहुँचाया गया। वर्ष 2012 के दौरान एक अत्यंत जोखिम भरे ऑपरेशन के वक्त उन्हें शरीर पर पाँच गोलियाँ लगने के बावजूद उन्होंने अपने हौसले को टूटने नहीं दिया और कुछ ही महीनों के भीतर स्वस्थ होकर पुनः रणक्षेत्र में लौट आए।

उनके इसी असाधारण पराक्रम और उत्कृष्ट सेवा के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित शौर्य चक्र के साथ-साथ कई बार राष्ट्रपति के पुलिस पदक (पीएमजी) से अलंकृत किया जा चुका है। झारखंड के खूंटी जिले के घने जंगलों में पंद्रह लाख रुपये के कुख्यात इनामी रीजनल कमांडर के खिलाफ चलाए गए एक अन्य चुनौतीपूर्ण अभियान में भी उन्होंने अत्यंत सूझबूझ और असाधारण रणनीतिक कौशल का परिचय देते हुए नक्सलियों के सुदृढ़ दुर्ग को ध्वस्त कर दिया था, जो आज भी सुरक्षा बलों की कार्यशैली का एक स्वर्णिम उदाहरण माना जाता है।

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