क्या बच्चे जन्म से पहले ही सीख सकते हैं पौराणिक ज्ञान? जानें गर्भ संस्कार का महत्व और उससे जुड़े फायदे

कभी दादी-नानी की कहानियों में सुना था कि मां जो सोचती है, जो सुनती है, उसका असर बच्चे पर पड़ता है. अब वही बात एक बार फिर सुर्खियों में है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विश्वविद्यालयों में ‘गर्भ संस्कार’ पढ़ाने और सरकारी अस्पतालों में ‘गर्भ संस्कार कक्ष’ बनाने की घोषणा की है. बस, इसी के साथ महाभारत के अभिमन्यु और महाज्ञानी अष्टावक्र की कहानियां फिर चर्चा में आ गई हैं. सवाल सिर्फ आस्था का नहीं, जिज्ञासा का भी है-क्या सच में गर्भ में पल रहा बच्चा सीख सकता है? सनातन परंपरा में इसे पहला संस्कार माना गया है, जिसका मकसद मां को शांत, सकारात्मक माहौल देना और आने वाली संतान के अच्छे गुणों की कामना करना बताया जाता है. इन दावों के पीछे जो पौराणिक कथाएं हैं, वे रोचक भी हैं और सोचने पर मजबूर भी करती हैं.
क्या है गर्भ संस्कार का विचार?
सीधी भाषा में समझें तो गर्भ संस्कार उस सोच पर टिका है कि गर्भवती महिला का खान-पान, व्यवहार, माहौल, संगीत, पढ़ी-सुनी बातें-सब बच्चे पर असर डालते हैं. गांवों में आज भी बुजुर्ग कहते मिल जाएंगे, “गर्भ में गुस्सा मत करो, बच्चा चिड़चिड़ा होगा” या “अच्छी बातें सुनो, बच्चा समझदार बनेगा.” यही लोकमान्यता धर्मग्रंथों में संस्कार के रूप में दिखती है.
परंपरा बनाम आधुनिक नजरिया
आधुनिक विज्ञान मां के तनाव, पोषण और भावनात्मक स्थिति का असर बच्चे पर मानता है. हालांकि, पौराणिक कथाओं जैसा ‘गर्भ में ज्ञान सुन लेना’ विज्ञान का विषय नहीं, आस्था का हिस्सा है, लेकिन इन कहानियों ने सदियों से लोगों की सोच को आकार दिया है.
अभिमन्यु: अधूरी सीखी विद्या
महाभारत का यह प्रसंग सबसे ज्यादा सुनाया जाता है. अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह तोड़ने की रणनीति समझा रहे थे. कहा जाता है कि गर्भ में पल रहे अभिमन्यु यह सब सुन रहे थे. उन्होंने चक्रव्यूह में घुसने की विधि तो सुन ली, लेकिन बाहर निकलने का तरीका पूरी तरह नहीं सुन पाए-क्योंकि सुभद्रा सो गई थीं.
युद्ध में दिखा असर
कुरुक्षेत्र के युद्ध में यही बात सच होती दिखी. अभिमन्यु चक्रव्यूह तो तोड़ देते हैं, पर बाहर निकलने की पूरी जानकारी न होने के कारण घिर जाते हैं. यह कहानी अक्सर इस उदाहरण के रूप में सुनाई जाती है कि गर्भ में भी सीख संभव है, पर अधूरा ज्ञान खतरनाक हो सकता है.
अष्टावक्र: गर्भ से ही विद्वान?
दूसरी कहानी अष्टावक्र की है, जो अपने ज्ञान के लिए जाने जाते हैं. मान्यता है कि उनके पिता कहोड़ वेद पढ़ाते थे और मां सुजाता गर्भावस्था में वह सब सुनती थीं. गर्भ में ही अष्टावक्र ने वेदों का ज्ञान पा लिया.
पिता को ही टोक दिया
कहानी कहती है कि एक दिन उन्होंने गर्भ से ही पिता के उच्चारण में गलती बता दी. पिता नाराज हुए और श्राप दे दिया कि बच्चा आठ जगह से टेढ़ा जन्म लेगा. इसी कारण उनका नाम पड़ा-अष्टावक्र. शरीर टेढ़ा था, लेकिन बुद्धि तेज. बाद में उन्होंने शास्त्रार्थ में विद्वानों को हराया और ‘अष्टावक्र गीता’ जैसा ज्ञान दिया.
क्यों फिर चर्चा में हैं ये कथाएं?
मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद ये कहानियां सिर्फ धार्मिक मंचों पर नहीं, सोशल मीडिया और कॉलेज बहसों में भी घूम रही हैं. कुछ लोग इसे संस्कृति से जोड़कर देख रहे हैं, तो कुछ सवाल उठा रहे हैं कि इसे पढ़ाई का हिस्सा कैसे बनाया जाएगा.
आम लोगों की दिलचस्पी
दिलचस्प बात यह है कि शहरों में प्रेग्नेंसी के दौरान म्यूजिक थेरेपी, योग, मेडिटेशन जैसी चीजें पहले से लोकप्रिय हैं. कई मां-बाप मानते हैं कि पॉजिटिव माहौल से फर्क पड़ता है. ऐसे में गर्भ संस्कार की चर्चा लोगों को नई नहीं लगती, बस भाषा और संदर्भ अलग हैं.
कहानी, आस्था और सोच
इन कथाओं को ऐतिहासिक घटना मानें या प्रतीकात्मक कहानी, एक बात साफ है-ये समाज को यह संदेश देती हैं कि बच्चे का निर्माण जन्म से पहले ही शुरू मान लिया गया था. मां का मानसिक संतुलन, शांत माहौल, अच्छे विचार-इन सबको अहम माना गया. आज जब यह विषय नीति स्तर तक पहुंचा है, तो बहस होना तय है. लेकिन अभिमन्यु और अष्टावक्र की कहानियां एक बार फिर लोगों को यह सोचने पर जरूर मजबूर कर रही हैं कि परंपरा में कही गई बातों को आधुनिक नजर से कैसे समझा जाए.
