
जयपुर|जोधपुर जिला कलेक्ट्रेट मंगलवार को उस वक्त सियासी अखाड़ा बन गया, जब मनरेगा के मुद्दे पर निकली राजस्थान युवा कांग्रेस की ‘मनरेगा बचाओ महासंग्राम पदयात्रा’ विरोध प्रदर्शन से आगे बढ़कर खुले टकराव में बदल गई। संगरिया विधायक अभिमन्यु पूनिया के नेतृत्व में सोजती गेट से निकली पदयात्रा जैसे ही कलेक्ट्रेट परिसर के बाहर पहुंची, माहौल तनावपूर्ण हो गया और देखते ही देखते एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने प्रशासन और राजनीति—दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया।करीब एक घंटे तक कलेक्ट्रेट के मुख्य द्वार पर कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लगा रहा। मांग साफ थी—जिला कलेक्टर खुद बाहर आकर ज्ञापन लें। प्रशासनिक अमले ने नियमों का हवाला देते हुए केवल पांच प्रतिनिधियों को अंदर भेजने की बात कही, लेकिन प्रदर्शनकारी इस पर अड़े रहे कि ज्ञापन बाहर ही लिया जाए। इसी जिद और खींचतान के बीच मामला उस बिंदु पर पहुंच गया, जहां शिष्टाचार की सीमाएं टूटती दिखीं।स्थिति संभालने के लिए राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और एसडीएम पंकज जैन स्वयं चैंबर से बाहर आए। कांग्रेस के पूर्व मंत्री राजेंद्र चौधरी और भोपालगढ़ विधायक गीता बरवड़ ज्ञापन लेकर आगे बढ़े, लेकिन तभी पीछे से आए संगरिया विधायक अभिमन्यु पूनिया ने अचानक ज्ञापन छीन लिया। अगले ही पल ज्ञापन फाड़ा गया और कथित तौर पर एसडीएम के मुंह की ओर फेंक दिया गया। यह दृश्य वहां मौजूद पुलिसकर्मियों, प्रशासनिक अधिकारियों और कांग्रेस नेताओं—सभी के लिए अप्रत्याशित था।घटना के बाद कुछ क्षणों के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। पूनिया मौके से चले गए, जबकि बाकी नेता स्थिति को संभालने की कोशिश करते रहे। कलेक्ट्रेट के बाहर जमा भीड़ में नाराजगी साफ झलक रही थी। यह सिर्फ एक ज्ञापन का फटना नहीं था, बल्कि मनरेगा, प्रशासनिक रवैये और सत्ता के खिलाफ गुस्से की सार्वजनिक अभिव्यक्ति थी।बाद में एनडीटीवी से खास बातचीत में संगरिया विधायक अभिमन्यु पूनिया ने प्रशासन पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि “प्रशासनिक अधिकारी भाजपा सरकार की कठपुतली बनकर काम कर रहे हैं। मनरेगा से ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को रोजगार मिलता है, लेकिन सरकार इसे कमजोर कर रही है। अगर अधिकारी बाहर आकर ज्ञापन तक नहीं लेंगे, तो यह जनता के अपमान जैसा है।” पूनिया ने साफ चेतावनी दी कि यदि यही रवैया रहा तो युवा कांग्रेस सड़क पर उतरने से भी पीछे नहीं हटेगी।युवा कांग्रेस की इस पदयात्रा में पूर्व मंत्री राजेंद्र चौधरी, विधायक गीता बरवड़ सहित कई पदाधिकारी और कार्यकर्ता शामिल थे। उनका आरोप था कि मनरेगा के तहत काम के दिन घटाए जा रहे हैं, भुगतान में देरी हो रही है और ग्रामीण मजदूर बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि सरकार जमीनी हकीकत से कट चुकी है और प्रशासन जनता की आवाज सुनने को तैयार नहीं।हालांकि प्रशासनिक स्तर पर इस पूरे घटनाक्रम को नियमों और सुरक्षा व्यवस्था से जोड़कर देखा जा रहा है। अधिकारियों का तर्क है कि कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील परिसर में तय प्रक्रिया का पालन जरूरी है, जबकि कांग्रेस इसे जनप्रतिनिधियों के अपमान और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बता रही है।जोधपुर कलेक्ट्रेट के बाहर हुआ यह वाकया अब केवल एक स्थानीय विरोध नहीं रहा। यह घटना प्रशासन बनाम जनप्रतिनिधि, नियम बनाम जनआक्रोश और सत्ता बनाम सवाल—इन तमाम टकरावों का प्रतीक बनकर सामने आई है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार और प्रशासन इस विरोध को कैसे लेते हैं और मनरेगा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं। फिलहाल, जोधपुर की सड़कों पर उठा यह सियासी उबाल शांत होने के संकेत नहीं दे रहा।