कौन है उत्तराखंड के लोक देवता गंगनाथ, जो नेपाल से आए थे कुमाऊं, आज भी करते हैं न्याय

कुमाऊं की लोकआस्था में गंगनाथ देवता का नाम न्याय, सत्य और मनोकामना पूर्ति के प्रतीक के रूप में बड़े श्रद्धा भाव से लिया जाता है. जिस तरह गोलू देवता को न्याय का देवता माना जाता है, उसी तरह गंगनाथ देवता भी पीढ़ियों से लोगों के विश्वास का केंद्र रहे हैं. कुमाऊं के गांव-गांव में उनके मंदिर मिल जाते हैं, जहां श्रद्धालु अपनी फरियाद लेकर पहुंचते हैं और घंटियां चढ़ाकर न्याय की गुहार लगाते हैं.
लोककथाओं के अनुसार गंगनाथ देवता का संबंध नेपाल के डोटी राज्य से माना जाता है. कहा जाता है कि वे डोटी के राजा उदय चंद के ज्येष्ठ पुत्र थे. ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि गंगनाथ 12 वर्ष की आयु में बैराग्य धारण कर लेंगे. इस भविष्यवाणी को टालने के लिए राजा ने अनोखा उपाय अपनाया और 12 वर्ष से पहले सात बार उनका विवाह लोहे की मूर्तियों से करवाया, लेकिन नियति को कौन टाल सका है.
इस वजह से देवता के रूप में पूजे जाते हैं गंगनाथ
नैनीताल के चिड़ियाघर स्थित गंगनाथ मंदिर के पुजारी संतोष पांडे के अनुसार 12 वर्ष की आयु में गंगनाथ को स्वप्न में एक युवती दिखाई दी, जिससे उनका प्रेम संबंध स्थापित हो गया. इस युवती का नाम भाना बताया जाता है, जो वर्तमान अल्मोड़ा जिले के दन्यां क्षेत्र के कुरकौली गांव की निवासी थी. कथा कहती है कि गंगनाथ भाना से मिलने के लिए पनार नदी पार कर गांव पहुंचे. एक रात भाना ने रस्सी के सहारे उन्हें अपने कमरे में खींच लिया, लेकिन यह बात गांववालों की नजर में आ गई. इसके बाद गांव में पंचायत बैठी और ब्राह्मणों के निर्णय के बाद गंगनाथ की हत्या कर दी गई.
मान्यता है कि मृत्यु के बाद गंगनाथ प्रेत योनि में चले गए और गांव में तरह-तरह के कष्ट फैलने लगे. भयभीत ग्रामीणों ने अंततः गंगनाथ का मंदिर स्थापित किया और उन्हें देवता का दर्जा दिया. तभी से उन्हें न्याय करने वाले देवता के रूप में पूजा जाने लगा. आज भी उनकी यह गाथा जागरों में गाई जाती है, जो कुमाऊं की लोकसंस्कृति की एक महत्वपूर्ण धरोहर है.
इतिहास के इस युद्ध से जुड़ी है घटना
हालांकि इतिहासकार इस जनश्रुति को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते. प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. अजय रावत के अनुसार गंगनाथ की मृत्यु प्रेम प्रसंग या हत्या से नहीं, बल्कि युद्ध में हुई थी. उनके मुताबिक 17वीं शताब्दी में डोटी के राजा उदय चंद ने कुमाऊं के चंद वंशीय शासकों पर आक्रमण किया था. उस समय चंपावत से राजधानी अल्मोड़ा स्थानांतरित की जा चुकी थी. इसी युद्ध के दौरान गंगनाथ वीरगति को प्राप्त हुए और अपने राज्य के लिए अदम्य साहस का परिचय देते हुए प्राण न्यौछावर कर दिए.
उत्तराखंड और नेपाल में प्राचीन काल से मान्यता रही है कि जो योद्धा युद्ध भूमि में देश के लिए प्राण त्यागता है, उसे देवत्व प्राप्त होता है, इसी परंपरा के तहत ऐसे वीरों को देवता के रूप में पूजा जाने लगा. इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की पत्नी या माता को राजा द्वारा सम्मानित किया जाता था और उन्हें जागीर दी जाती थी, जिसे ‘रौत’ कहा जाता था. आज गंगनाथ देवता कुमाऊं के आराध्य देव माने जाते हैं. नैनीताल के चिड़ियाघर स्थित गंगनाथ मंदिर में लगी असंख्य घंटियां इस बात की साक्षी हैं कि गंगनाथ देवता को आज भी लोग दुःख-कष्ट हरने वाले और सच्चा न्याय देने वाले देवता के रूप में पूजते हैं.
