ओशो ने कहा है इसलिए कुंभ में आते हैं लोग, गंगा स्नान से क्या होता है

कुंभ का महापर्व शुरु हो चुका है। संक्रांति के बाद से कुंभ में शाही स्नान का आगाज भी हो गया। कुंभ से जुड़ी कुछ दिलचस्प तथ्य ओशो ने बताए हैं। महागुरु ओशो के अनुसार कुंभ एक तरह का बड़े संख्या में लोगों पर किया जाने वाला प्रयोग है। जिसका उद्देश्य है एक निश्चित समय अंतराल के बाद किसी विशेष दिन करोड़ों लोग एक तीर्थ पर इकट्ठे होते हैं। सभी एक ही आकांक्षा, एक ही अभीप्सा से सैकड़ों मील की यात्रा करके आते हैं। खास यह है कि एक विशेष घड़ी में, एक विशेष तारे के साथ, एक विशेष नक्षत्र में एक जगह इकट्ठे हो जाते हैं। ओशो ने कुंभ से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में बताया है। वह कहते हैं कि पहली बात समझनी चाहिए कि यह जो करोड़ लोग इकट्ठा हुए हैं एक अभीप्सा और एक आकांक्षा से, एक प्रार्थना से, एक ध्वनि, एक धुन के साथ यहां आते हैं। धीरे-धीरे कुंभ चेतना का एक पुल बन गया है।

ओशो का मानना था कि कुंभ में अब व्यक्ति नहीं हैं, अगर कुंभ में देखें तो व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ता। भीड़, और सिर्फ भीड़ दिखाई देती है। ओशो कहते हैं कि भीड़ के चलते चेहरा नहीं दिखाई देता है। सब बिना चेहरे के दिखाई देते हैं। एक करोड़ आदमी इकट्ठा हैं। कौन-कौन है, अब कोई अर्थ नहीं रह गया। कौन राजा है, कौन रंक है, अब कोई मतलब नहीं रह गया। कौन गरीब है, कौन अमीर है, कोई मतलब नहीं रह गया, जब सब बिना चेहरे के ही हैं। ये एक करोड़ आदमी एक ही अभीप्सा से एक विशेष घड़ी में इकट्ठे हुए हैं–एक ही प्रार्थना से, एक ही आकांक्षा से। इन सबकी चेतनाएं एक-दूसरे के भीतर प्रवाहित होनी शुरू होंगी। अगर एक करोड़ लोगों की चेतना का पुल बन सके, एक इकट्ठा रूप बन जाए, तो इस चेतना के भीतर परमात्मा का प्रवेश जितना आसान है उतना आसान एक-एक व्यक्ति के भीतर नहीं है। इसमें लोगों का संपर्क होना अत्यधिक आसान है।
मनुष्य की चेतना जितना बड़ा संपर्क क्षेत्र निर्मित करती है, परमात्मा का अवतरण उतना आसान हो जाता है। क्योंकि वह इतनी बड़ी घटना है, उस बड़ी घटना के लिए, जितनी जगह हम बना सकें उतनी उपयोगी है। व्यक्तिगत प्रार्थना तो बहुत बाद में पैदा हुई। प्रार्थना का मूल रूप तो समूहगत है। व्यक्तिगत प्रार्थना तो तब पैदा हुई जब एक-एक आदमी को भारी अहंकार पकड़ना शुरू हो गया। जब मनुष्य का एकदूसरे के साथ जुड़ना होना मुश्किल हो गया, इसलिए जब से व्यक्तिगत प्रार्थना दुनिया में शुरू हुई तब से प्रार्थना का फायदा कहीं खो गया।असल में प्रार्थना व्यक्तिगत नहीं हो सकती। जब हम इतनी बड़ी शक्ति का आवाह्न करते हैं तो उसके अवतरण के लिए, हम जितना बड़ा क्षेत्र दे सकें उतना ही सुगम होगा। तीर्थ उस बड़े क्षेत्र को निर्मित करते हैं, फिर खास घड़ी में करते हैं, खास नक्षत्र में करते हैं, खास दिन पर करते हैं, खास वर्ष में करते हैं। वे सब सुनिश्चित विधियां थीं। यानी उस घड़ी में, उस नक्षत्र में पहले भी संपर्क हुआ है। जीवन की सारी व्यवस्था आवर्ती है।
इसे भी समझ लेना चाहिए। जैसे कि वर्षा एक खास दिन पर आती थी, और अगर आज के समय में नहीं आती खास दिन पर, तो उसका कारण यह है कि हमने छेड़छाड़ की है। अन्यथा दिन बिलकुल तय थे, घड़ी तय थी, सब तय था, वह उस वक्त आ जाती थी।

गर्मी आती थी खास वक्त, सर्दी आती थी खास वक्त, वसंत आता था खास वक्त–सब बंधा था। शरीर भी बिलकुल वैसा ही काम करता है। स्त्रियों का मासिक धर्म है, वह ठीक चांद के साथ चलता रहता है। ठीक अट्ठाइस दिन में उसे लौट आना चाहिए। अगर बिल्कुल ठीक है, शरीर स्वस्थ है, तो वह अट्ठाइस दिन में लौट आना चाहिए। वह चांद के साथ यात्रा कर रहा है। वह अट्ठाइस दिन में नहीं लौटता, तो क्रम टूट गया है व्यक्तित्व का, भीतर कहीं कोई गड़बड़ हो गई है। सारी घटनाएं एक क्रम में आवर्तित होती हैं।
तो अगर किसी एक घड़ी में परमात्मा का अवतरण हो गया, तो उस घड़ी को हम अगले वर्ष के लिए फिर नोट कर सकते हैं। संभावना उस घड़ी की बढ़ गई, तो वह घड़ी ज्यादा सामर्थ्य हो गई, उस घड़ी में परमात्मा की धारा पुनः प्रवाहित हो सकती है। इसलिए पुनः-पुनः उस घड़ी में सैकड़ों वर्षों तक तीर्थ पर लोग इकट्ठे होते रहेंगे और अगर यह कई बार हो चुका तो वह घड़ी सुनिश्चित होती जाएगी, वह बिलकुल तय हो जाएगी।

अब जैसे कि कुंभ के मेले पर गंगा में कौन पहले उतरे, वह भारी दंगे का कारण हो जाता है। क्योंकि इतने लोग इकट्ठे नहीं उतर सकते एक घड़ी में, और वह घड़ी तो बहुत सुनिश्चित है, बहुत बारीक है, तो उसमें कौन उतरे उस पहली घड़ी में, वह सुनिश्चित हो गया है। जिन्होंने वह घड़ी खोजी है या जिनकी परंपरा और जिनकी धारा में उस घड़ी का पहले अवतरण हुआ है, वे उसके मालिक हैं। वे उस घड़ी में पहले उतर जाएंगे। और कभी-कभी इंच का फर्क हो जाता है। परमात्मा का अवतरण करीब-करीब बिजली की कौंध जैसा है कौंधा और खो गया। उस क्षण में आप खुले रहे, जगे रहे, तो घटना घट जाए। उस क्षण में आंख बंद हो गई, सोए रहे, तो घटना खो जाए।

तीर्थ का तीसरा महत्व था: समूह प्रयोग, जिससे अधिकतम विराट पैमाने पर लोगों को उतारा जा सके। जब लोग सरल थे तो यह घटना बड़ी आसानी से घटती थी। ऐसा नहीं था, उस दिन तीर्थ बड़े सार्थक थे। तीर्थ से कभी कोई खाली नहीं लौटता था, लेकिन आज के समय खाली लौट आता है, फिर भी आदमी फिर दुबारा चला जाता है। उस दिन कोई खाली नहीं लौटता था, वह परिवर्तित होकर लौटता ही था हालांकि यह बहुत सरल और मासूम समाज की घटनाएं हैं, क्योंकि जितना सरल समाज हो और जहां व्यक्तित्व का बोध जितना कम हो, वहां तीर्थ का यह तीसरा प्रयोग काम करेगा, अन्यथा नहीं करेगा।
जब समाज बहुत हम के बोध से भरा था और मैं का बोध बहुत कम था, तब तीर्थ बड़ा कारगर था, बहुत कारगर था। अब उसकी उपयोगिता उसी मात्रा में कम हो जाएगी, जिस मात्रा में मैं का बोध बढ़ जाएगा।

और आखिरी बात जो तीर्थ के बाबत ख्याल में रखनी चाहिए, वह यह कि प्रतीकात्मक कृत्य का मूल्य भारी है। जैसे जीसस के पास कोई आता है और कहता है, मैंने यह यह पाप किए हैं। वह जीसस के सामने कबूल करके सब बता देता है। जैसे जीसस उसके सर पर हाथ रख कर कह देंगे कि जा तुझे माफ किया। अब इस आदमी ने पाप किए हैं, जीसस के कहने से माफ कैसे हो जाएंगे? जीसस कौन हैं? और उनके हाथ रखने से माफ हो जाएंगे? तो इस आदमी ने खून किया, उसका क्या होगा? हमने कहा कि आदमी पाप करे और गंगा में स्नान कर ले और मुक्त हो जाएगा। यह बिल्कुल पागलपन लगता है, क्योंकि इसने हत्या की है, चोरी की है, बेईमानी की है, गंगा में स्नान करके मुक्त कैसे हो जाएगा? इसलिए अब यहां दो बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक तो यह कि पाप असली घटना नहीं है, स्मृति असली घटना है, स्मृति आपका पीछा करेगी कि पत्थर की तरह आपकी छाती पर पड़ी रहेगी। वह कृत्य तो गया, अनंत में खो गया। वह कृत्य तो अनंत ने संभाल लिया। सच तो यह है कि सब कृत्य अनंत के हैं। आप नाहक उसके लिए परेशान हैं। अगर चोरी भी हुई है आपसे तो भी अनंत के ही द्वारा आपसे हुई है। आप नाहक बीच में अपनी स्मृति लेकर खड़े हैं कि मैंने किया। अब यह मैंने किया और यह स्मृति आपकी छाती पर बोझ है।

तो जीसस कहते हैं, तुम कबूल करो, मैं तुम्हें माफ किए देता हूं, और जो जीसस पर भरोसा करता है वह पवित्र होकर लौटेगा। असल में जीसस पाप से तो मुक्त नहीं कर सकते, लेकिन स्मृति से मुक्त कर सकते हैं। स्मृति ही असली सवाल है। गंगा पाप से मुक्त नहीं कर सकती, लेकिन स्मृति से मुक्त कर सकती है। अगर कोई भरोसा लेकर गया है कि गंगा में डुबकी लगाते ही से सारे पाप से बाहर हो जाऊंगा, और ऐसा अगर उसके चित्त में और उसकी यादों की गठरियों में है तो उस समाज के, करोड़ों वर्ष की धारणा है कि गंगा में डुबकी लगाने से पाप से छुटकारा हो जाता है। पाप से छुटकारा नहीं होगा, चोरी को अब कुछ और नहीं किया जा सकता, लेकिन जब व्यक्ति पानी के बाहर निकलेगा तो प्रतीकात्मक कृत्य हो गया।
 

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