गांधी मैदान में सम्पन्न हुआ देश का सबसे बड़ा राखी महोत्सव एवं स्वतंत्रता दिवस समारोह 

जोधपुर  । गांधी मैदान के विशाल प्रांगण में हजारों भाई-बहिनों ने 15 अगस्त व राखी पर्व के पावन अवसर पर राष्ट्र-संत चन्द्रप्रभ महाराज, महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज और मुनि शांतिप्रियसागर महाराज के सान्निध्य में रक्षाबंधन महोत्सव व स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाने का आनन्द उठाया। 
जब गुरुजनों ने सर्वप्रथम बिना भाई की बहिनों को रक्षासूत्र समर्पित करने का अवसर दिया तो सैकड़ों बहिनें भाव-विह्वल होकर रक्षासूत्र लेकर मंच पर आईं और सजल आँखों से गुरुहाथों पर राखी समर्पित की जिससे पूरे पांडाल में श्रद्धा, भक्ति और प्रेम का अद्भुत माहौल बन गया। फिर सभी सत्संगप्रेमियों ने गुरुजनों को राखी बाँधकर जीवन का कल्याण और रक्षा करने की प्रार्थना की। इस अवसर पर सत्संगप्रेमियों की ओर से संतों को 41 फुट की विशाल राखी भी समर्पित की गई। 
इस अवसर पर संत चन्द्रप्रभ महाराज ने कहा कि रक्षाबंधन रिश्तों में मिठास घोलने और टूटे रिश्तों को साँधने का पर्व है। रिश्तों को बनाना आसान है, पर उन्हें मीठा-मधुर बनाकर रखना मुश्किल है। रिश्तों को बनाना तो ठीक वैसे ही है जैसे मिट्टी पर मिट्टी से मिट्टी लिखना, पर उन्हें निभाना पानी पर पानी से पानी लिखने जैसा है। उन्होंने कहा कि हमारे रिश्ते रोटी जैसे न हो कि थोड़ी-सी आँच क्या लगी कि वह काली पड़ गई, रिश्ते तो मछली और सरोवर जैसे होने चाहिए कि जब तक जिएँगे तब तक साथ-साथ रहेंगे। जो घर को सदा जोड़कर रखे समझना वह बुद्धिमान और बुद्धिनिधान है। उन्होंने बहुओं को समझाया कि जो बहुएँ घर को तोड़ती हैं वह घर के लिए अभिशाप बन जाती है, पर जो बहू घर को किसी भी हालत में टूटने नहीं देती वही घर की महालक्ष्मी कहलाया करती है। लक्ष्मी की पूजा करने से पता नहीं लक्ष्मी जी कितने प्रतिशत आएँगे, पर घर की बहुएँ महालक्ष्मी बन जाए तो घर में सदा लक्ष्मीजी का बसेरा हो जाएगा। 
जोडने का आधार रू राखी का त्यौहार-संतप्रवर ने कहा कि राखी महज धागों को बाँधने का नहीं, आपस में जुडने और जोडने का त्यौहार है। अगर हमारे रिश्तों में दरार आ गई है, अगर हमारी किसी से बोलचाल नहीं है तो हम उन्हें फोन लगाएँ और कहें कि मैं आपसे राखी बाँधने या आपको राखी बाँधने आ रहा हूँ, बस आपका इतना-सा बड़प्पन इस पर्व को धन्य कर देगा और दूरियाँ हमेशा के लिए जीवन से दूर हो जाएगी। 
एक-दूसरे की रक्षा का संकल्प है राखी-संतप्रवर ने कहा कि राखी एक-दूसरे की रक्षा करने का महान संकल्प है। जैसे कभी अतीत में भगवान श्री .ष्ण ने द्रोपदी की चीर बढ़ाकर रक्षा की थी, राजा हुमायूँ ने पश्चिम बंगाल में चल रहे अपने युद्ध को छोड़कर रानी कर्णावती के राज्य को शत्रुओं से बचाया था ठीक वैसे ही हम भी नारी-जाति की आन, बान और शान की रक्षा करने का संकल्प लें। मर जाएँगे, पर नारी की लाज को मिटने नहीं देंगे। 
बहिन बिना भाई अधूरा और परिवार सूना-संतप्रवर ने कहा कि बहिन बिना भाई अधूरा है तो परिवार सूना। हम अपने घर में पुत्र के रूप में न केवल लक्ष्मण को चाहें बल्कि लक्ष्मी के रूप में कन्या को भी जन्म दें। जिस घर में कन्या का जन्म नहीं होता उस घर में कभी कल्पवृक्ष नहीं लहराता। लक्ष्मी आएगी तो कल्पवृक्ष अपने आप लहराएगा। उन्होंने कहा कि आज के दिन तो संत-हृदय भी द्रवित हो उठता है। यद्यपि हमें सगी बहिनें न मिली, पर भगवान को धन्यवाद है कि उसने हमें हजारों बहिनें दी हैं। जब तक हम जीवित हैं किसी भी बहिन पर आँच आने नहीं देंगे। उन्होंने कहा कि महिला को अपनी जिंदगी में दो लोगों का ही आसरा होता है एक पति का और दूसरा भाई का। कंधे से कंधा मिलाकर जो साथ रहे और संकट की घड़ी में हनुमान की भूमिका निभाए वह भाई भाई नहीं बहिन के लिए भगवान है। 
भूण-हत्या है राखी का अपमान-संतप्रवर ने कहा कि भ्रूण-हत्या करना राखी का अपमान करना है। हर संतान ईश्वर के घर से मिला उपहार है। उसकी कोख में हत्या करना स्वयं ईश्वर की हत्या करना है। अगर आप संतान नहीं चाहते तो उसे पैदा करके हमारे द्वार पर छोड़ दें, हम जैसे संत उसका पालन-पोषण कर लेंगे। आज हजारों लोग ऐसे हैं जो संतान न होने की वजह से बिलख रहे हैं, अगर आपने ऐसा पाप किया तो आपको भी ऐसे ही बिलखना पड़ेगा। आप कोख में आई संतान को अवश्य जन्म दें और संतान रहित दंपति को उसे उपहार में दे दें, उनका वंश आबाद हो जाएगा और वे जिंदगी भर आपके ऋणी भी बने रहेंगे।  
मन की गाँठें खोलें और राखी बाँधें-संतप्रवर ने कहा कि राखी केवल भाई-बहिन ही नहीं, वरन्् सास-बहू, देवरानी-जेठानी, भाई-भाई, देवर-भाभी भी बनाएँ और राखी बाँधने के बहाने किसी से किसी भी तरह का मनमुटाव हो तो मन की गाँठें खोल लें। मन की गाँठें खोलने से बड़ा कोई धर्म नहीं है अन्यथा ये गाँठें हमारी जन्म-जन्मांतर तक पीछा करती रहेंगी। उन्होंने कहा कि जैसे वर्ष पूरा होने पर हम केलेण्डर उतार के फेंक देते हैं ठीक वैसे नया साल आने से पहले आपसी मनमुटाव, दूरियाँ और पुरानी बातों को रद्दी की टोकरी में फेंक दें। जिस दिन राखी के बहाने दो टूटे हुए एक हो जाएँगे समझना उस दिन विश्व मैत्री दिवस साकार हो उठेगा। 
इस अवसर पर राष्ट्रसंतों के सानिध्य में स्वतंत्रता दिवस पर विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ। जोधपुर के इतिहास में पहली बार ऐसा मौका आया जब शहरवासी 73 फीट लंबे तिरंगे को देखकर हर्ष विभोर हो गए। कार्यक्रम में इंडो पब्लिक स्कूल की बालिकाओं द्वारा आजादी के जश्न पर प्रस्तुत किए गए सांस्.तिक नृत्य को देख कर श्रद्धालु झूम उठे। 
आओ, 10 मिनट दें राष्ट्र के नाम विषय पर जनमानस को संबोधित करते हुए संत चंद्रप्रभ ने कहा कि हमें भारतीय होने पर गर्व होना चाहिए और रोज सुबह उठकर भारत भूमि और इसे आजादी दिलाने वाले महापुरुषों को साष्टांग प्रणाम करना चाहिए। भारत भूमि पर इतने महापुरुषों ने जन्म लिया है कि अगर हम भारत की मिट्टी को शीष पर धारण करेंगे तो वह भी मंदिर के चंदन की चुटकी का काम करेगी। 
उन्होंने कहा कि आतंकवाद और नक्सलवाद को छोड़ दें तो भारत भूमि जैसा स्वर्ग विश्व में कहीं नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत कोई जमीन का टुकड़ा नहीं, वरन एक जीता जागता दर्शन और गौरवपूर्ण संस्.ति है। अनेकता में एकता ही हमारी शान है इसीलिए हमारा भारत महान है। हमें अपनी पहचान हिंदू, मुस्लिम, जैन, सिख इसाई, बौद्ध के रूप में देने की बजाय भारतीय के रूप में देनी चाहिए। देश सबसे पहले हैं। अगर हम धर्म-भावना से पहले राष्ट्रीय- भावना से भर जाएं तो हमारा भारत पुन: विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हो सकता है। 
उन्होंने कहा कि अहिंसा, प्रेम, शांति, भाईचारा, त्याग और तप हमारी नींव है। अगर पाकिस्तान ने लड़ने की बजाय भारत से हाथ मिलाया होता तो आज भारत-पाकिस्तान विश्व की सबसे बड़ी ताकत बन चुके होते। 
उन्होंने कहा कि हर देशवासी को यह जरूर सोचना चाहिए कि मैं देश के लिए क्या कर सकता हूँ।हम अपने भारत को स्वच्छ बनाएं, स्वस्थ बनाएं, शिक्षित बनाएं, संस्कारित बनाएं, समृद्ध बनाएं और सहयोगी बनाएं। हम न गंदगी करें न दूसरों को करने दें, यातायात के नियमों का व देश के कानूनों का पालन करें। अगर हम सब मिलकर मात्र 10 मिनट देश को समर्पित करें तो आने वाले 10 सालों में भारत का कायाकल्प हो सकता है। 
जब संतप्रवर ने देश हमारा सबसे प्यारा इस को गले लगाएं गीत मिलन के गाए…भजन गुनगुनाया तो हजारों श्रद्धालुओं ने आकाश में तिरंगे को लहराते हुए देश को सलामी दी। 

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