नरक चौदस का त्यौहार एक सामाजिक सन्देश भी है 

दीपावली के एक दिन पूर्व नरक चौदस का त्यौहार मनाया जाता है ।इसे छोटी दीवाली कहा जाता है तो कुछ लोग इस त्यौहार को भौम चौदस भी कहते हैं।इस संबंध में प्रचलित एक कथा के अनुसार इस. दिन नरकासुर नामक राक्षस का वध श्रीकृष्ण ने किया था ।इसे भूमि पुत्र भी कुछ कथाओं में कहा गया है। इस कारण कुछ लोग इसे भौम चौदस भी कहते.हैं।नरकासुर के बारे में यह प्रसिद्ध था कि उसने सोलहहजार कन्याओं को कैद कर रख़ा था। वह उनसे विवाह करना चाहता था।जब श्रीकृष्ण तक यह शिकायत पहुंची तब वे बहुत व्यथित हुये। नरकासुर प्रागज्योतिषपुर का राजा था । 
श्रीकृष्ण गज्योतिषपुर पहुंचे और उन्होंने भीषण युद्ध किया ।इस युद्ध में नरकासुर मारा गया। यह कथा भी; इस प्रसंग में  कही जाती है कि नरकासुर का पुत्र भगदत्तश्रीकृष्ण की युद्ध प्रवीणता से बहुत भयभीत हुआ । तब उस की मां पृथ्वी देवी ने उसे श्रीकृष्ण से अभयदान दिलाया।
कृष्ण इन राज्य कन्याओं के जनकों के स्वार्थ पर भी क्षुब्ध हुए।उन्होंने श्रीकृष्ण की सहायता लेकर अपनी बेटियों को स्वतंत्र तो करा लिया लेकिन लोकापवाद के भय से वे उन्हें वापस लेने इच्छुक नहीं थे। वैसे वे राज्य कन्यायें भी श्री कृष्ण से इतनी आकर्षित थीं कि वे ही उनको पति रूप में अपनाना चाहती थीं। श्रीकृष्ण के सामने भी लोकापवाद का संकट था।इन सोलह हजार राजकन्याओं से विवाह पर
लोग क्या कहेंगे राधा को लेकर लोग तरह तरह.की बात करते हैं।ऐसे में उन लोगो की बात को और बल मिलेगा ।लेकिन इन कन्याओं को इस प्रकार मंझधार में नहीं छोड़़ाजा सकता।नरकासुर की कैद से इन कन्याओं की मुक्ति के बाद उनका भी कुछ उत्तरदायित्व बनता था ।आखिरकार श्रीकृष्ण ने उनके परिवार जनों और परिचितों के.भारी विरोध के बाद भी इन राज कन्याओं से विवाह का निर्णय ले लिया ।अनेक ज्योतिषी भी इस निर्णय से सहमत नहीं थे। लेकिन श्रीकृष्ण ने किसी की नहीं सुनी।
उन्होंने एक अद्भुत कार्य अवश्य किया ।सबसे एक साथ विवाह किया।यह कार्य उस युग में वे ही कर सकते थे। यह कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने जितनी कन्यायें थीं उतने रूप धारण किये और सभी कन्याओं के साथ एक साथ विवाह किया। शायद रासलीला के बाद यह पहला और एकमात्र अवसर था जब श्रीकृष्ण ने इतने रूप धारण किये। रासलीला मे कहते हैं श्रीकृष्ण ने जितनी गोपियाँ थी उतने रुप धरे थे लेकिन वे स्वयं राधा के साथ थे
    इस घटना की याद में नरक चौदस का त्यौहार मनाया जाता है। यह कहा जाता है कि इस प्रसंग के बाद दीवाली का उत्साह कई गुना बढ़ गया था। क्योंकि अगले दिन ही दीवाली का त्यौहार था।  
    इस त्यौहार का महत्व उस समय जितना था उसकी तुलना में आज उसकी प्रासंगिकता बढ़ गई है। नरकासुर जैसे पात्र आज भी समाज में मौजूद है। जरुरत श्रीकृश्ण जैसे चरित्रों की है जो लोकापवाद की परवाह किये बिना अपना कर्तव्य निबाहें। नरकासुर जैसे राक्षस की कैद से मुक्ति के लिये तथा उनके सतीत्व की रक्षा के लिये श्रीकृश्ण सचेश्ट हुये थे। नरकासुर का प्रसंग एक प्रतीक है। महिलाओं की प्रतिश्ठा रक्षा के लिये श्रीकृश्ण का चरित्र एक आदर्श प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर यह भी उल्लेखनीय कि महिलाओं के सतीत्व से खेलने वाले को उस युग में भी असुर या राक्षस कहा जाता था।  
    कुछ आलोचक सोलह हजार की संख्या को अतिशयोक्ति पूर्ण बता सकते है। लेकिन नरकासुर की कैद में जितनी भी राजकन्याऐं हों, उनसे विवाह कर श्रीकृश्ण ने अभूतपूर्व नैतिक साहस का परिचय दिया था। उनके इस नैतिक साहस की आज भी आवश्यकता है।  
श्रीमद्भागवद में इस प्रसंग का वर्णन इस प्रकार हुआ है-  
तत्र राजकन्यानाम्् शटसहस्त्राधिकायुतम्
भौमो हतानां विकृम्य राजभ्यो ददृशे हरि। 
तमं प्रवश्टिम् स्त्रियो वीक्षय नरहरि विमोहिता:। 
मनसा वब्रिरोश्टिं पतिं दैवोपसादितम्।  

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