पुलिस अभिरक्षा में बंदी की मौत पर उत्तराधिकारियों को 5 लाख रूपये 2 माह में दें

पुलिस अभिरक्षा में बंदी की मौत पर उत्तराधिकारियों को 5 लाख रूपये 2 माह में दें

उच्च स्तरीय तथ्यान्वेषी समिति का गठन भी किया जाये

आयोग ने की अनुशंसा

मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग ने पुलिस अभिरक्षा में बंदी की मौत हो जाने के एक मामले में राज्य शासन से मृतक के उत्तराधिकारियों को पांच लाख रूपये क्षतिपूर्ति दो माह में देने की अनुशंसा की है। राज्य शासन चाहे, तो इस राशि की वसूली संबंधित पुलिस अधिकारी/पुलिसकर्मियों से कर सकता है। मामला वर्ष 2019 का है।
आयोग ने अपनी अनुशंसा में यह भी कहा है कि मध्यप्रदेश शासन पुलिस या जेल अभिरक्षा के दौरान बंदियों द्वारा की गई आत्महत्या के कारण अप्राकृतिक परिस्थितियों में हुई मृत्यु के मामलों में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के संदर्भित मामले में दिये गये निर्णय और अभिरक्षा प्रबंधन के लिए ऐसी मृत्यु के उपरांत शीघ्र इस पर विचार एवं दोषी लोकसेवकों के विरूद्ध कार्यवाही करे। साथ ही मृतकों के परिजनों को यथाशीघ्र आर्थिक मुआवजा राशि दिलाये जाने के संबंध में विचार हेतु एक उच्च स्तरीय तथ्यान्वेषी समिति का गठन करे, जिससे ऐसे मामलों में लोकसेवकों की भूमिका एवं मृतक के परिवार को आवश्यकतानुसार सहायता के साथ ही इनकी रोकथाम के लिए आवश्यक उपाय प्रदेश स्तर पर किये जा सकें और अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में आयोग में प्रस्तुत होने वाले ऐसे प्रकरणों की जांच और अंततः उनके निराकरण के कारण पीड़ितों को प्राप्त हो सकने वाले सहायता लाभों में अनावश्यक विलम्ब न हो।
आयोग ने प्रकरण क्र. 5820/छतरपुर/2019 में छतरपुर जिले के भगवां पुलिस थाने में अभिरक्षा में बंदी की मौत हो जाने के मामले में यह अनुशंसाएं की हैं। भगवां थाने के बंदी वीरन उर्फ वीरेन्द्र लोधी द्वारा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, बडामलहरा, जिला छतरपुर में पुलिस अभिरक्षा में मेडिकल परीक्षण के दौरान 30 सितम्बर 2018 को बाथरूम में रौशनदान की सलाखों में गमछे से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली गई थी। इस मामले में अनुसंधान अधिकारी/ पुलिसकर्मियों की अभिरक्षा प्रबंधन में उपेक्षा के साथ-साथ बंदी को अभिरक्षा में लेने के पश्चात उसके जीवन, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के अधिकार की उपेक्षा सहित उसके मानव अधिकारों की भी घोर उपेक्षा हुई।     

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