बांग्लादेश की जेल में 11 साल से कैद शख्स लौटा, घर की दहलीज पर बेटे को खड़ा देख छलक पड़े आंसू

बिहार के दरभंगा जिले के तुलसीडीह मनोरथा गांव का रहने वाला है सतीश चौधरी
मानसिक रूप से बीमार सतीश 15 सितंबर 2008 में अपने घर से चला गया था
चार साल बाद बांग्लादेश रेड क्रास सोसायटी ने दी थी सतीश के ढाका जेल में होने की जानकारी
मानवाधिकार कार्यकर्ता विशाल रंजन दफ्तुआर की मदद से छोटे भाई ने किए थे रिहाई के प्रयास
बिहार के दरभंगा जिले के एक गरीब परिवार का मानसिक रूप से बीमार बेटा बांग्लादेश में पिछले 11 साल से कैद था। लेकिन शनिवार को वह सकुशल घर पहुंच गया। इस शख्स का नाम है सतीश चौधरी। आखिर सतीश किन हालातों में जेल तक पहुंच गया, इसकी ठीक—ठीक जानकारी उसे भी नहीं है।
जानकारी के अनुसार, बिहार के पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के नाडिया जिले के दर्शना गेदे बॉर्डर से सतीश को 12 सितंबर को बांग्लादेश ने भारतीय सुरक्षा बलों के हवाले कर दिया। सतीश के छोटे भाई मुकेश ने बताया कि उसके भाई की रिहाई में मानवाधिकार कार्यकर्ता विशाल रंजन दफ्तुआर ने अहम भूमिका निभाई।
रिहाई के बाद मुकेश अपने भाई को ट्रेन से लेकर दरभंगा जिले के अशोक पेपर मिल थाना अंतर्गत तुलसीडीह मनोरथा गांव पहुंचा तो परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दरअसल तुलसीडीह मनोरथा गांव निवासी पिता रामविलास चौधरी अपने पुत्र सतीश और अन्य सदस्यों के साथ 12 अप्रैल 2008 को काम की तलाश में पटना आए हुए थे। जब वे 15 अप्रैल को वापस घर लौटे तो उनका बेटा सतीश गायब था। काफी तलाशने के बाद जब सतीश नहीं मिला तो उन्होंने 8 मई को थाने में शिकायत लिखा दी।
परिजनों के अनुसार सतीश के गायब होने के चार साल बाद 2012 में उन्हें बांग्लादेश रेड क्रास सोसायटी से सतीश के ढाका जेल में होने की जानकारी मिली। मुकेश ने बताया कि गत 28 जुलाई को बांग्लादेश स्थित भारतीय दूतावास से सतीश की तस्वीर वाट्सएप के जरिए भेजी गई थी और फोन पर हमसे उनके बारे में पूछताछ की गई।
मुकेश ने साथ ही आरोप लगाया कि इसके बाद कोई संपर्क नहीं किया गया। मुकेश ने कहा कि इसके बाद उन्होंने मानवाधिकार कार्यकता विशाल रंजन दफ्तुआर से संपर्क साधा और उनके जरिए ही सतीश की रिहाई के प्रयास हो सके।
