बाबे दा व्याहः सादे तरीके से मनाया जाएगा श्री गुरु नानक देव जी का विवाह पर्व, रवाना हुई बारात

सैकड़ों वर्षों से पहली पातशाही श्री गुरुनानक देव जी और बीबी सुलक्खनी जी के विवाह पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है, लेकिन इस बार बाबे दा व्याह सादे तरीके से मनाया जाएगा। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने बटाला में हुए हादसे के मद्देनजर यह फैसला लिया। गुरुद्वारा कंध साहिब के मैनेजर गुरतिंदरपाल सिंह भाटिया ने बताया कि पांच सितंबर को नगर कीर्तिन उस रोड से नहीं गुजरेगा, जिसके पास यह हादसा हुआ। इस बार कोई आतिशबाजी नहीं की जाएगी और न ही फूलों की वर्षा होगी।
पांच सितंबर को भी हर साल की तरह बटाला में बाबे का विवाह श्रद्धा से मनाया जा रहा है। गुरुद्वारों में चल रहे अखंड पाठ के भोग पड़ने के बाद वीरवार को सुल्तानपुर लोधी से बारात रूपी नगर कीर्तन बटाला पहुंचेगा। इसके बाद श्री गुरु ग्रंथ साहिब की छात्रछाया में गुरुद्वारा डेरा साहिब बटाला से एक विशाल नगर कीर्तन निकलेगा। यह पूरे शहर के बाजारों से होते हुए वीरवार देर शाम को गुरुद्वारा डेरा साहिब में संपन्न हो जाएगा। ऐतिहासिक पक्ष के अनुसार, बटाला के रहने वाले क्षत्रिय मूल चंद पटवारी की बेटी बीबी सुलक्खनी जी की सगाई श्री गुरुनानक देव जी से हुई थी।
इसी के चलते श्री गुरुनानक देव जी पूरी बारात के साथ सुल्तानपुर लोधी से बटाला शादी के लिए आए थे। इस विवाह पर्व को देखने के लिए सिख संगत देश विदेशों से भी बटाला पहुंचती है। गुरुद्वारा साहिब को दुल्हन की तरह सजाया जाता है। इस दिन श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को पालकी साहिब में सुशोभित कर सेहरा लगाकर नगर कीर्तन का आयोजन किया जाता है। जिन लोगों ने शादी की मन्नत मानी होती है और उनकी मन्नत पूरी हो जाती है तो वह गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष सेहरा भेंट करते हैं।
कच्ची कंध का ऐतिहासिक महत्व
गुरुद्वारा श्री कंध साहिब के बारे में यह प्रचलित है कि जब बाबा की बारात बटाला पहुंची थी तो उस समय थोड़ी-थोड़ी बारिश हो रही थी। जिस जगह पर बाबा नानक की बारात को ठहराया गया था वहां एक कच्ची दीवार थी जिसके नजदीक बाबा नानक को बैठना था।
जब गुरु साहिब दीवार के पास बैठे तो एक बुजुर्ग महिला ने कहा कि यह कंध (दीवार) कच्ची है और गिरने वाली है। वह वहां से उठ जाएं तो उन्होंने कहा कि माता यह दीवार तो युगों-युगों तक कायम रहेगी। वह दीवार आज भी गुरुद्वारा कंध साहिब में शीशे के फ्रेम में सुरक्षित है। बाद में महाराजा नौनिहाल सिंह ने वहां गुरुद्वारा साहिब बनाया जहां वह कंध थी।
बारात का किया जाता है स्वागत
1487 में श्री गुरुनानक देव जी सुल्तानपुर लोधी से सज-धजकर कपूरथला, सुभानपुर, बाबा बकाला से होते हुए ऐतिहासिक शहर बटाला में बारात के रूप में पहुंचे थे। गुरु जी की बारात के बटाला पहुंचने पर भव्य स्वागत किया गया था। जिस जगह पर गुरु जी के फेरों की रस्म हुई थी वह आजकल गुरुद्वारा डेरा साहिब के नाम से प्रचलित है। आज भी श्री गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूप में सुल्तानपुर लोधी से चली बारात का बटाला पहुंचने पर शहर के वरिष्ठ लोग और विभिन्न संगठन स्वागत करते हैं।
