बारिश के पानी को सहेजने में सरकारी सिस्टम फेल

भोपाल । आम लोगों को रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाकर पानी सहेजने का ज्ञान देने वाला सरकारी सिस्टम इस मामले में खुद ही फेल है। राजधानी में कई ऐसे सरकारी भवन है जहां पर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगाया गया है। यहां तक की सतपुड़ा भवन हो या विध्यांचल भवन हो अथवा जयप्रकाश-हमीदिया अस्पताल। इन बडे-बडे सरकारी भवनों में रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगाया गया है। इतना ही नहीं, नगर निगम के कई भवनों में भी रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगे हैं। हर साल सिस्टम लगाने के दावे जरूर किए जाते हैं, लेकिन हकीकत में सिस्टम लगते नहीं। लिहाजा, हर साल करोड़ों लीटर पानी फिजूल बह जाता है और गर्मी आने से पहले ही भू-जल स्तर पाताल में पहुंचने लगता है। अप्रैल-मई की गर्मी में कई क्षेत्रों में भू-जल स्तर औसत 500 फीट तक नीचे पहुंच जाता है और ट्यूबवेल पर आश्रित बड़ी आबादी को बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना पड़ता है। दरअसल, राजधानी में भूमिगत जल का लगातार दोहन हो रहा है। इससे भू-जल स्तर गिरता जा रहा है। कोलार के गेहूंखेड़ा, पुलिस हाउसिंग सोसायटी, बैरागढ़-चीचली, भेल टाउनशिप आदि क्षेत्रों में जलापूर्ति के लिए ट्यूबवेल ही एकमात्र साधन है, जो गर्मी से पहले ही सूखने लगते हैं। इस कारण लाखों लोग निजी टैंकरों पर निर्भर हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि जमीन के अंदर बारिश का पानी संग्रहित नहीं किया जाता। नगर निगम की भवन अनुज्ञा शाखा शहर में बिल्डिंग की अनुमति देता है। 140 वर्गमीटर से ऊपर के प्लॉट साइज में परमिशन के लिए वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने का प्रविधान है, लेकिन यह महज खानापूर्ति तक सीमित है। जोन व वार्ड कार्यालयों में सिस्टम नहीं लगे हैं तो फायर स्टेशन में भी यही स्थिति है। जब निगम ही अपने भवनों पर यह सिस्टम नहीं लगवा पा रहा है तो लोगों में जागरूकता कैसे आएगी। यह एक बड़ा सवाल है। पुराने वल्लभ भवन, विंध्याचल और सतपुड़ा भवन में लगभग सभी प्रमुख शासकीय विभाग संचालित होते हैं। इन्हीं विभागों में बैठने वाले मंत्री व अधिकारी प्रदेश के विकास की योजना बनाते हैं। यहां तक कि निचले विभागों और आम जनता को पानी बचाने की सीख भी देते हैं, लेकिन इन तीनों प्रमुख भवनों की छतों पर गिरने वाले बारिश के पानी को नहीं सहेजा जा रहा है। हर साल लाखों लीटर पानी नालों में बह रहा है। इन तीनों मुख्य भवनों का रखरखाव करने वाले अधिकारियों ने बताया कि इनके निर्माण के समय के बाद से अब तक छतों पर जमा होने वाले पानी को सहेजने के लिए रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगाया गया है। बता दें कि विंध्याचल, सतपुड़ा भवन और पुराने वल्लभ भवन तीनों की छतों का कुल क्षेत्रफल 92 हजार वर्गमीटर है। रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अपनाकर इन छतों पर गिरने वाला बारिश का लाखों लीटर पानी हर साल बचाया जा सकता है। जयप्रकाश अस्पताल में तीन अलग-अलग भवन हैं, लेकिन एक में भी रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगा है। हमीदिया अस्पताल में बन रहे दो हजार बिस्तरों वाले भवन में सिस्टम लगवाया जा रहा है, पर पुराने भवन में नहीं है। एमपी नगर स्थित भोपाल विकास प्राधिकरण, पर्यावरण भवन, कलेक्टोरेट आदि में भी सिस्टम नहीं लगे हैं। इस बारे में सीपीए के अनुविभागीय अधिकारी सीपी जायसवाल का कहना है कि विंध्याचल, सतपुड़ा एवं पुराने वल्लभ भवन के भवन में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं है। उक्त सिस्टम को लगाने का प्रयास करेंगे, ताकि छतों पर गिरने वाले बारिश के पानी को बचाया जा सके। वहीं निगमायुक्त वीएस चौधरी कोलसानी का कहना है कि बारिश के पानी को सहेजने के लिए हरसंभव प्रयास किए जाते हैं। निगम के सभी भवनों में सिस्टम लगवाए जाएंगे। लोगों को भी प्रेरित करेंगे।
