मिलावटी दूध से संदेह के घेरे में खाद्य अफसरों की भूमिका

भोपाल । मिलावटी दूध पकड़े जाने के बाद घरों तक पहुंच रहे सफेद जहर ने हर किसी को चिंता में डाल दिया है। जो दूध सेहत के लिए फायदेमंद बताया जाता है, वही जहर बनकर घरों तक पहुंच रहा था। यह गोरखधंधा सालों से जारी था, अब पकड़ में आया है, इसलिए हायतौबा मच रही है। प्रशासन से लेकर सरकार तक कड़ी कार्रवाई की बात कह रही है, मगर सवाल यह है कि पूरी मशीनरी अब तक सोती क्यों रही। दूध में वर्षों से यूरिया, डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा, अमोनियम सल्फेट, फार्मलीन जैसे खतरनाक रसायनों को मिलाकर पिलाया जाता रहा, मगर मिलावटखोरों पर कार्रवाई न होने से हौसले बुलंद थे। इस पूरे मामले में खाद्य विभाग की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है।
करोड़ों का है कारोबार
दूध में मिलावट का खेल इतनी बारीकी से होता है कि आमतौर पर पहचाना मुश्किल होता है। यह कारोबार पिछले लंबे अर्से से जारी है। करोड़ों के इस अवैध कारोबार में जिम्मेवारों के शामिल होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। एसटीएफ ने फिलहाल जिन आरोपियों को पकड़ा है वे चौंकाने वाले खुलासे कर रहे हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि इसमें खाद्य विभाग का अमला इस ओर से क्यों आंखेंं मूदें था, इसका खुलासा भी जांच के बाद जल्द होगा। दरअसल जिन पर इसकी जांच की जिम्मेदारी है, वो खुद किसी शिकायत का इंतजार करते हैं। नहीं तो इनकी जांच करना भी ये जरूरी नहीं समझते। यही कारण है कि आज मिलावट का कारोबार प्रदेशभर में पैर पसार चुका है।
15 जिलों में मिलावटी दूध का धंधा
मध्य प्रदेश के 15 जिले ऐसे हैं, जहां सबसे अधिक मिलावट हो रही है। भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के नेशनल मिल्क सर्वे की रिपोर्ट में इसका खुलासा हो चुका है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर, उज्जैन, बालाघाट, मुरैना, इंदौर, खरगोन, धार, रतलाम, अशोक नगर, भिंड, होशंगाबाद, खंडवा, बुरहानपुर, बड़वानी और सिवनी जिले में दूध में मिलावट की जा रही है। मध्यप्रदेश समेत पूरे देश में मिलावटी दूध को लेकर डल्यूएचओ और नेशनल मिल्क की सर्वे रिपोर्ट में मिल्क प्रोडशन और कंजप्शन के बीच करीब 50 करोड़ लीटर का फर्क है। इसमें पाउडर से बने दूध का भी बराबर योगदान है। इसके बावजूद बड़ी मात्रा में आपूर्ति मिलावटी दूध से ही हो रही है। 
किडनी और लिवर के लिए घातक
मिलावटी दूध के सेवन से पेट की समस्या हो सकती है। लीवर और किडनी पर बुरा असर होता है। दूध में डिटर्जेट मिलाने से डाइजेस्टिव सिस्टम इफेक्टिव होता है। वॉइटनर लीवर और किडनी के लिए खतरनाक है। वहीं यूरिया तो कैंसर का कारण बन सकता है। यह दूध कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का भी बड़ा कारण होता है। कैमिकल मिला दूघ शरीर के एम्यून सिस्टम को भी प्रभावित करता है और कई बार शरीर के अंग भी काम करना बंद कर देते हैं।
पहचान करना मुश्किल
दूध में मिलावट का खेल इतनी बारीकी से होता है कि आमतौर पर पहचाना मुश्किल होता है। सिर्फ उसके स्वाद और रंग से पहचान हो पाती है। मिलावटी दूध का स्वाद मीठा के बजाय कड़वा होता है। गर्म करने पर रंग नेचुरल हल्का पीला के बजाय सफेद ही रहता है।
कैंसर तक का खतरा
दूध में हर वो तत्व पाया जाता है, जिसकी व्यति को जरूरत होती है। मिलावटी दूध के कई दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि यूरिया, कास्टिक सोडा और इसमें मौजूद फोरमेलिन से गैस्ट्रोएंट्राइटिटिस से लेकर इपेयरमेंट, दिल के रोग और कैंसर हो सकते हैं। यहां तक कि मिलावटी दूध पीने से व्यति की मौत तक हो सकती है। डिटर्जेंट से पाचन तंत्र की गड़बडिय़ां और फूड प्वायजनिंग हो सकती है। हाई एल्केलाइन से शरीर के तंतु क्षतिग्रस्त और प्रोटीन नष्ट हो सकते हैं।
अब तक 62 आरोपी गिरफ्तार 
एसटीएफ की कार्यवाही में मुरैना के अबाह में वन खडेश्वरी डेयरी एण्ड फैट्री से 12 हजार लीटर सिंथेटिक दूध और 2500 लीटर कच्चा दूध मिला है। यहां के फैट्री संचालक देवेंद्र गुर्जर, जयवीर गुर्जर, रामनरेश गुर्जर और दिनेश गुर्जर हैं। पुलिस ने फैक्ट्री से 25 लोगों को गिरफ्तार किया है। जबकि भिंड के लहार स्थित गिर्राज फूड सप्लायर फैट्री से 500-500 लीटर के तीन दूध टैंकर पकड़े गए हैं, जिनमें 1100 लीटर सिन्थेटिक दूध जप्त किया है। फैक्ट्री का संचालक संतोष सिंह है। यहां से सात लोगों को गिरफ्तार किया है और तीन टैंकर पकड़े हैं। जबकि आईस फैक्ट्री एवं चीलिंग सेंटर लहार से 2000 लीटर सिन्थेटिक दूध एवं 1000 किलो सिन्थेटिक मावा और 1500 किलो सिन्थेटिक पनीर पकड़ा गया है। उत सिन्थेटिक दूध फैट्री से मौके पर 30 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। फैट्री संचालक राजीव गुप्ता है।
शिकायतों पर कार्रवाई पर नतीजा फिसर
मिलावट खोरों पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभाग की है। वह इस ओर विशेष ध्यान नहीं देता है। मिलावटी मिल्क और मिल्क प्रॉडक्ट की शिकायत लगातार आती है। इसके बाद भी शहर में आने वाले दूध की जांच नहीं होती। सिर्फ त्योहार के आसपास दो-चार दिन के लिए कार्रवाई की जाती है। वह भी महज औपचारिकता के तौर पर। इसका पूरा फायदा मिलावटखोर उठा रहे हैं। 
मावा और पनीर के फेल
शहर में आ रहे दूध के केमिकल तेा नहीं मिलाया जा रहा है। इसे लेकर अगस्त 2018 में जुलाई 2019 के बीव में दूध के 9 नमूनों की जांच प्रयोगशाल में कराई गई, जहां पर यह सभी पास हो गए। गत कुछ सालों में मावा में सबसे अधिक मिलावट सामने आई है। राजधानी की बात करें तो यहां मावा ग्वालियर से आता है। जो जांच में कम ही खरे उतरे पाते हैं। गत एक साल में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने मावा के 19 नमूने के लिए, जिसमें 6 नमूने जांच में फेल हो गए। वहीं पनीर के 25 सेंपल लिए गए, जांच में सात में मिलावट सामने आई। हालंाकि इनमें जांच के दौरान घातक केमिकल नहीं मिले। इसी तरह घी के 10 नमूने लिए गए, जिसमें सभी पास हो गए।  

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