मुस्लिम, दलित, ओबीसी को लुभाने मायावती ने लिया सोशल इंजीनियरिंग का सहारा

लखनऊ । सन 2022 में होने वाले यूपी विधानसभा के चुनाव से पहले बसपा प्रमुख मायावती पार्टी को सांगठनिक मजबूती देने और उसका जनाधार बढ़ाने के लिए एक बार फिर सोशल इंजीनियरिंग का सहारा ले रही हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के आम चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सर्वोच्‍चता स्‍थापित करने का एक मौका देखकर, मायावती ने गुरुवार को एक मुस्लिम, एक दलित और एक ओबीसी सहित तीन राज्य समन्वयक नियुक्त किए हैं। मायावती का मानना है कि इसका उन्हें उत्तर प्रदेश की 13 विधानसभाओं में होने वाले उप-चुनाव में भी लाभ होगा।
मायवती ने मुस्लिम समुदाय से आने वाले मुनकाद अली, दलित एमएलसी बीआर आंबेडकर और पार्टी में प्रमुख ओबीसी नेता आरएस कुशवाहा को स्‍टेट कोऑर्डिनेटर नियुक्‍त किया है। मुनकाद अली बसपा प्रदेश इकाई के प्रमुख बनने वाले पहले मुस्लिम नेता हैं। इन तीनों से कहा गया है कि वे यूपी के हर हिस्‍से का दौरा करें और सीधे मायावती को रिपोर्ट करें। 
पार्टी के एक वरिष्‍ठ नेता ने बताया हम गैर यादव और गैर लोध ओबीसी मतदाताओं को फिर से पार्टी में लौटाने पर फोकस करेंगे। हमने महसूस किया कि भले ही हमने लोकसभा चुनाव सपा के साथ मिलकर लड़ा, लेकिन ओबीसी और दलितों का एक समूह हमसे दूर हो गया है। मायावती अल्‍पसंख्‍यकों पर भी ध्‍यान केंद्रित कर रही हैं। इस वर्ग को लुभाने के लिए ही उन्होंने मुनकाद अली को पार्टी की राज्य इकाई का पहला मुस्लिम अध्यक्ष चुना गया। 
मुनकाद को राज्य समन्वयक बनाकर उनके कद को और बढ़ा दिया गया है। हालांकि पार्टी के सूत्र बताते हैं कि बसपा मुसलमानों की पहली पसंद नहीं है, लेकिन उन्‍हें लुभाकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से दूर करना इस समय बहुत अहम है। पार्टी के एक और सदस्‍य ने बताया कि गुरुवार को बहनजी ने राज्‍य इकाई का विकेंद्रीकरण कर दिया है। पहले तीन मंडलों पर एक जोन इंचार्ज होता था, अब एक व्‍यक्ति को एक मंडल का चार्ज दिया गया है। इसी तरह से बहुत से पदाधिकारियों की जिम्‍मेदारियां कम करके उन्‍हें और लोगों में बांटा गया है। पार्टी ने आने वाले उपचुनाव में केंद्र और राज्य सरकारों की नाकामियों, जैसे-अर्थव्यवस्था की स्थिति, बढ़ती बेरोजगारी, खराब कानून-व्यवस्था को भी जनता के सामने लाने की योजना बनाई है।   

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