रिश्तों में अवमूल्यन को नहीं रोका गया तो परंपरागत संस्कृति को बड़ा ख़तरा : पं. विजय शंकर मेहता 

इन्दौर । अत्याधुनिक संचार साधनों ने एक ही छत के नीचे रहने वाले परिजनों के बीच की दूरी बढ़ा दी है। यहां तक कि इन साधनों का उपयोग करने वाला मनुष्य स्वयं अपने से ही दूर होता जा रहा है। पीढ़ियों का अंतर वैसे तो हर स्तर पर देखने को मिलता है लेकिन वर्तमान में यह अंतर कुछ ज्यादा गहरा हो गया है। रिश्तों में अवमूल्यन की यह स्थिति हमारी परंपरागत संस्कृति के लिए बड़ा खतरा है। समय रहते यदि हमने संबंधों में समरसता की प्राण प्रतिष्ठा नहीं की, तो आने वाले दिनों में स्थिति और ज्यादा बिगड़ सकती है। 
प्रख्यात चिंतक, लेखक और जीवन प्रबंधन गुरू पं. विजय शंकर मेहता ने आज शाम श्री हरि सत्संग समिति एवं वनबंधु परिषद महिला समिति के तत्वावधान में श्रीमती सरलादेवी नारायणदास मुछाल की स्मृति में रवींद्र नाट्यगृह में आयोजित व्याख्यान में ऐसी अनेक बातें कही। ‘संबंधों में समरसता के सूत्र’ जैसे सामयिक विषय पर आयोजित इस प्रसंग का शुभारंभ दीप प्रज्जवलन के साथ हुआ। प्रारभ में आयोजन समिति की ओर से प्रकाश धानुका, अनिल चौधरी, रामविलास राठी, सी.के. अग्रवाल, वनबंधु परिषद के शिवकुमार चौधरी, विनोद अग्रवाल, रामअवतार जाजू, रसनिधि कुमार गुप्ता, महिला समिति की राष्ट्रीय अध्यक्ष गीता मूंदड़ा, इंदौर चेप्टर की अध्यक्ष शिखा मुछाल एवं सचिव माधवी झंवर आदि ने पं. मेहता का स्वागत किया। कार्यक्रम संयोजक प्रेमेंद्र सिंघल ने विषय प्रवर्तन किया। 
पं. मेहता ने कहा कि संचार क्रांति वर्तमान युग के लिए भले ही वरदान हो, परिवारों के सदस्यों के बीच मनुष्य और उसके मन की दूरियां बढ़ती जा रही है। एक ही घर मंे रहने वाले लोग जब आपस में बातचीत के लिए संचार साधनों का प्रयोग करने लगें, फेसबुक पर 5-5 हजार मित्रों की फौज खड़ी कर लें, लेकिन घर के सदस्यों से संवाद भी न करें तो यह संचार क्रांति हमारी परंपरागत संस्कृति में सेंध लगाने वाली साबित हो रही है। ऐसा नहीं है कि हम संचार साधनों का प्रयोग ही बंद कर दें लेकिन जब हमारे प्रत्येक कर्म की निर्भरता इन मशीनी उपकरणों पर होने लगे तो यह अच्छा संकेत नहीं हो सकता। नई और पुरानी पीढ़ी के बीच संवादहीनता, बुजुर्गों द्वारा संस्कारों के लिए आग्रह करने और फिर इन दोनों के बीच होने वाले द्वंद्व के कारण हमारी पीढ़ी एक विचित्र अवसाद का शिकार हो रही है। इस स्थिति में संबंधों में आ रहे अवमूल्यन के कारणों की तलाश कर उन्हें दूर करना जरूरी है। हम बुजुर्गों को सम्मान देंगे तो बदले में स्नेह मिलेगा ही। गुरूकुल से लेकर घर के बुजुर्गों के पैर छूने और उनके आशीर्वाद लेने जैसी हमारी सारी परंपराएं अब विलुप्ति के कगार पर आ गई हैं। इन्हें समय रहते नहीं बचाया गया तो स्थिति और अधिक भयावह हो सकती है। व्याख्यान में शहर के अनेक गणमान्य नागरिक एवं समाजसेवी बंधु बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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