समस्त ज्ञान का सार गीता

श्रीमद‍्भगवद‍्गीता गीता वेदों का निचोड़ एवं उपनिषदों का सार है। श्रीकृष्ण रूपी गोपाल उपनिषद रूपी गाय को दुहकर अर्जुन रूपी बछड़े को इसका दुग्धामृत पिलाते हैं, जो हर काल के मनुष्यमात्र के लिए संजीवनी स्वरूप है। हर युग में, हर स्वभाव के सुपात्र व्यक्ति के लिए उपयुक्त ज्ञान एवं संदेश इसमें निहित है।
इस रूप में गीता देश ही नहीं, पूरे विश्व के लिए भारतभूमि का एक वरदान है। यह भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से निकला कालजयी ज्ञान का अक्षय निर्झर है, जिसने हर युग में इंसान को जीवन जीने की राह दिखाई है। भारत ही नहीं, विश्व के हर कोने से प्रबुद्धजनों, विचारकों एवं ज्ञान पिपासुओं ने इसका पान किया और मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
भारतीय सांस्कृतिक नवजागरण के अगुआ स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में, वेदों पर गीता से बेहतर टीका नहीं लिखी गयी है और न ही संभव है। गीता में उपलब्ध श्रीकृष्ण भगवान की शिक्षाएं भव्यतम हैं, जिन्हें विश्व ने जाना है। रामकृष्ण परमहंस गीता को अपना सतत ् सहचर बनाने की सलाह देते थे। महर्षि अरविंद के शब्दों में, गीता मानव जाति के लिए आध्यात्मिक सृजन का सबसे महान सुसमाचार है। यह देश की प्रमुख राष्ट्रीय विरासत और भविष्य की आशा है। मदन मोहन मालवीय के मत में, पूरे विश्व साहित्य में गीता के समान कोई ग्रंथ नहीं, जो न केवल हिंदुओं, बल्कि पूरी मानवता के लिए धर्म-अध्यात्म का खजाना है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के मत में, गीता न केवल मेरी बाईबिल या कुरान है, बल्कि यह तो इनसे भी बढ़कर मेरी मां के समान है। जब भी मैं कठिनाई या दुविधा में होता हूं, तो मैं इसके आंचल की शरण में शांति पाता हूं। गीता की कर्मयोग के आधार पर व्याख्या करने वाले तिलकजी के शब्दों में, गीता अपने प्राचीन पावन ग्रंथों में सबसे उत्कृष्ट एवं पावन नगीना है।
भारतीय वांङगमय में दर्जनों गीता ग्रंथ हैं, जिनका संदेश प्रायः शांत-एकांत पलों में प्रकट हुआ। जबकि श्रीकृष्ण के श्रीमुख से नि:सृत श्रीमद‍्भगवद‍्गीता एकमात्र उपदेश है, जो युद्ध के मैदान के बीच दिया गया। यही इसकी विशेषता है, जो इसे जीवन के रणक्षेत्र के बीच भी प्रासंगिक बनाती है। भारतीय अध्यात्म का इसमें सार समाया है। आश्चर्य नहीं कि गीता का महत्व सामान्य पलों में अनुभव नहीं होता, यह तो विषाद के विशिष्ट पलों का ज्ञानामृत है, जिसे विषाद-संताप से तप्त इंसान ही गहनता में समझ सकता है और इन पलों में यह संजीवनी का काम करता है। गीता की शुरुआत अर्जुन के विषाद के साथ होती है, जिसमें वह किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में युद्ध न लड़ने की वकालत करते हैं। इस अवस्था से उबारने के लिए श्रीकृष्ण क्रमिक रूप में अर्जुन को जाग्रत करते हैं। सबसे पहले वे विषादग्रस्त अर्जुन को स्व के अजर, अनित्य, अविनाशी आत्म-स्वरूप का बोध कराते हैं। अपने स्वधर्म के अनुरूप रणक्षेत्र में जूझने की बात करते हैं। जीवन की आध्यात्मिक समझ एक महत्वपूर्ण तत्व है, जिसकी पृष्ठभूमि में फिर श्रीकृष्ण निष्कामकर्म के रूप में कर्मयोग का विधान समझाते हैं।
हमारे सभी कर्म प्रायः आशा-अपेक्षा एवं स्वार्थ-अहं के दायरे में होते हैं, जो अपने फल के साथ चिंता व संताप भी लाते हैं। ऐसे सकाम कर्मों की सीमा व निष्काम कर्म का व्यावहारिक महत्व श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं। अहं-स्वार्थ के दायरे से बाहर निकलकर किया गया यज्ञमय कर्म गीता का महत्वपूर्ण संदेश है, जो हमें विराट से जोड़ता है। निष्काम कर्म के साथ चित्त शुद्धि का आध्यात्मिक उद्देश्य सिद्ध होता है, भावशुद्धि होती है और भक्ति भाव का उदय एवं विकास होता है।
ज्ञान एवं कर्मयोग के साथ श्री कृष्ण भक्ति के महत्व को समझाते हैं। अपनी दिव्य विभूतियों से परिचित करवाते हैं और क्रमशः अपने विराट स्वरूप के दर्शन के साथ अर्जुन को समर्पण भाव की ओर ले जाते हैं। ईश्वर के सनातन अंश के रूप में अर्जुन का आत्मबोध और ईश्वर के विराट स्वरूप के दर्शन के साथ अर्जुन का मोहभंग होता है। भक्ति भाव का जागरण होता है और इसी के साथ वे सुमरण के साथ धर्मयुद्ध के भाव को हृदयंगम करते हैं। नष्टो मोहः स्मृतिलब्धा… करिष्ये वचनं त्व के साथ अर्जुन रणक्षेत्र में क्षात्रधर्म का पालन करने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं।
इसी के साथ चंचल मन के निग्रह के लिए गीता में ध्यान योग, राज योग का भी प्रतिपादन है। कैसे व कहां ध्यान करना चाहिए, विस्तार से वर्णित है। इसमें मन की स्थिरता के लिए संतुलित जीवनचर्या का प्रतिपादन है। सबका निचोड़ जीवन के समत्व (समत्व योग उच्यते) के रूप में है।
जीवन की हर परिस्थिति में बिना संतुलन खोए, द्वन्द्वों के बीच समभाव, यह गीता की आधारभूत शिक्षा है। इसके साथ कर्मकुशलता (योगः कर्मशु कौशलं) के रूप में गीता व्यावहारिक शिक्षा का प्रतिपादन करती है।
जीवन के रणक्षेत्र से पलायन नहीं, वीरतापूर्वक इसकी चुनौतियों का सामना और सत्य के पक्ष में धर्मयुद्ध, गीता में निहित शाश्वत-सर्वकालिक संदेश है, जो इसे सदैव प्रासंगिक बनाता है।
गीता के अनुसार, पापी से पापी व्यक्ति भी यदि प्रभु की शरण में आता है, तो वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है, परमात्मा स्वयं उसका योग-क्षेम वहन करते हैं, उसका उद्धार सुनिश्चित है, परमात्मा का भक्त कभी नष्ट नहीं पता। भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से ऐसे वचन संतप्त हृदय को आश्वस्त करते हैं।

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