हरियाणा विस चुनावः सियासी कुनबों की साख का सवाल, लोकसभा में प्रदर्शन रहा बेहद निराशाजनक

हरियाणा में करीब पांच दशक की राजनीति में कुछ सियासी कुनबों का खासा प्रभाव रहा है। लगभग चार दशक का कार्यकाल तो ऐसा रहा, जब सीएम की कुर्सी पर इन्हीं कुनबों का कब्जा रहा। सूबे की राजनीति इन्ही कुनबों के ईद-गिर्द घूमती रही। वर्ष 2014 से पहले देखें तो इन्ही कुनबों का दबदबा राजनीति में जबरदस्त ढंग से बना रहा। मगर अक्तूबर 2014 में पहली बार भाजपा ने बिना बैसाखी अपने बूते पर सरकार बनाई और अपना कार्यकाल भी पूरा किया।
अब हरियाणा के यह सियासी कुनबे दोबारा सत्ता पर काबिज होने को न केवल बेकरार है, बल्कि अपनी सरकार बनाने के लिए हर तिकड़मबाजी में भी जुटे हुए हैं। कुछ कुनबे आज भी एकजुट होकर दोबारा सत्ता हासिल करने का संघर्ष कर रहे हैं, जबकि एक बड़ा सियासी कुनबा सत्ता की चाहत में बिखर कर रह गया है। अब चूंकि फिर से हरियाणा विधानसभा के मुहाने पर खड़ा है, ये सियासी कुनबे पूरी तरह से सक्त्रिस्य हैं।
पिछले साल जींद उपचुनाव और इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में कुनबो की सियासत कुछ खास नहीं कर पाई। ऐसी परिस्थितियों में अब अक्तूबर 2019 के विधानसभा चुनाव इन सियासी कुनबों के लिए ‘साख’ का सवाल बन गया है। साख ही नहीं कुछ के लिए तो ये चुनाव अब वजूद का भी सवाल है। लिहाजा इन सियासी कुनबों को एड़ी चोटी का जोर लगाकर न केवल विधानसभा चुनाव में खुद को साबित करना होगा, बल्कि अपनी भावी पीढ़ी के लिए एक मजबूत प्लेटफार्म तैयार करना होगा।
ताऊ के बिखरे कुनबे के सामने ढेरों चुनौतियां
हरियाणा में ताऊ देवीलाल का कुनबा आज बिखर चुका है। देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री रहे देवीलाल के दोनों पोतों ( पूर्व सीएम ओपी चौटाला के बेटों) की सियासी राहें अलग-अलग हो चुकी है। ओपी चौटाला अपने छोटे बेटे अभय चौटाला के साथ इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) का झंडा बुलंद किए हुए हैं, तो बड़े बेटे अजय चौटाला इनेलो से अलग होकर जननायक जनता पार्टी (जजपा) के बैनर तले अपनी राजनीति आगे बढ़ा रहे हैं।
नगर निगम चुनाव, जींद उपचुनाव हों या फिर लोकसभा चुनाव दोनों ही दलों को इन चुनावोंएक भी सीट हासिल नहीं हुई है। जबकि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव इनेलो के दो सांसद थे और विधानसभा में समर्थित विधायक समेत 20 विधायकों के साथ इनेलो मुख्य विपक्षी दल था। ताऊ की चौथी पीढ़ी यानी अभय के बेटे करण-अर्जुन और अजय के बेटे दुष्यंत-दििग्विजय चौटाला भी मैदान में है। जबकि घर की बहुएं अब राजनीति में पूरी तरह सक्रिय है।
कुल मिलाकर ताऊ का लगभग पूरा कुनबा इस विधानसभा चुनाव में अपना-अपना वजूद बचाने और सत्ता प्राप्ति के लिए मैदान में डटा हुआ है। फिलहाल इनेलो 4 मार्च 2005 से सत्ता से बाहर है। ओपी चौटाला 4 बार और ताऊ देवीलाल 2 बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
हुड्डा परिवार को फिर जलवे की दरकार
जाट राजनीति का दिग्गज कहे जाना वाला हुड्डा परिवार को आज फिर से अपने जलवे की दरकार है। स्वतंत्रता सेनानी, संविधान सभा के सदस्य और संयुक्त पंजाब में मंत्री रहे रणबीर सिंह हुड्डा के परिवार का सियासी सफर अभी जारी है। वर्ष 2005 से लेकर 2014 तक इस परिवार का जलवा रहा। लगातार दो बार रणबीर सिंह के बेटे भूपेंद्र सिंह हुड्डा हरियाणा के मुख्यमंत्री बनी और आज भी विधानसभा में सीएलपी लीडर हैं।
रणबीर सिंह की तीसरी पीढ़ी दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी पूरी तरह राजनीति में सक्त्रिस्य हैं। वर्ष 2005 से 2019 तक तीन बार के लगातार सांसद रहे दीपेंद्र मई 2019 में हुआ लोकसभा चुनाव हार गए। दीपेंद्र ही नहीं उनके दो बार केसीएम और पूर्व सांसद रहे पिता भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी इस बार सोनीपत से लोकसभा चुनाव लड़ा था, मगर उन्हे भी हार का मुंह देखना पड़ा।
अब कांग्रेस ने फिर से हरियाणा के विधानसभा चुनाव की कमान भी भूपेंद्र सिंह हुड्डा को ही सौंपी है। उम्मीद है लोकसभा की तरह इस बार फिर पिता-पुत्र यानी भूपेंद्र और दीपेंद्र अब विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। लेकिन उनके कुनबे की राजनीति इस चुनाव के नतीजे तय करेंगे।
बंसीलाल के कुनबा भी कर रहा संघर्ष
हरियाणा में तीन बार के सीएम रह चुके बंसी लाल का कुनबा भी राजनीति में पूरी तरह सक्रिय है और ‘संघर्ष’ के साथ आगे बढ़ रहा है। इंदिरा गांधी के करीबी रहे पूर्व सीएम बंसी लाल ने वर्ष 1996 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) का गठन किया था और भाजपा गठबंधन के साथ मिलकर वे तीसरी बार प्रदेश के सीएम बने थे। मगर वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में बंसीलाल की पार्टी महज 2 सीटों पर सिमट गई। बंसीलाल के बेटे सुरेंद्र सिंह भी चुनाव हार गए।
वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में भी बंसीलाल की पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई। इस पर बंसीलाल के बेटे सुरेंद्र सिंह ने पिता से अलग लाइन लेते हुए हविपा का कांग्रेस में विलय करवा दिया। वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में बंसीलाल के दोनों बेटों सुरेंद्र सिंह और रणबीर सिंह ने चुनाव लड़ा और दोनों चुनाव जीत गए। उस वक्त सीएम बने भूपेंद्र ङ्क्षसह हुड्डा ने सुरेंद्र सिंह को कैबिनेट मंत्री भी बनाया। लेकिन मंत्री बनने के कुछ दिन बाद एक विमान हादसे में सुरेंद्र सिंह का निधन हो गया।
निधन के बाद सुरेंद्र सिंह की पत्नी किरण चौधरी तोशाम सीट से चुनाव लड़ी और विधायक बनीं। वर्ष 2006 में बंसीलाल का भी निधन हो गया। 2009 के लोकसभा चुनाव में बंसीलाल की तीसरी पीढ़ी यानी उनकी पोती श्रुति चौधरी (सुरेंद्र सिंह की बेटी) की सियासत में एंट्री हुई और वे भिवानी-महेंद्रगढ़ सीट से सांसद चुनी गईं। लेकिन बाद में 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में श्रुति को हार झेलनी पड़ी। उधर, उनकी मां किरण चौधरी 2014 का विधानसभा चुनाव जीत गई और कांग्रेस विधायक दल की नेता भी बनी। अब कुनबे की सियासत को मजबूती से आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी किरण चौधरी ने उठा रखी है।
नतीजे तय करेंगे भजन लाल कुनबे की सियासत
हरियाणा में राजनीति के चाणक्य और दलबदल ‘इंजीनियर’ कहे जाने वाले पूर्व सीएम चौधरी भजनलाल के कुनबा भी सियासत में खासा प्रभाव रखता है। दो बार सीएम रह चुके भजनलाल के परिवार मे उनकी पत्नी जसमा देवी, बेटा चंद्रमोहन बिश्नोई, कुलदीप बिश्नोई, पुत्रवधू रेणुका बिश्नोई और अब पोता भव्य बिश्नोई पूरी तरह सक्त्रिस्य है। प्रदेश की राजनीति में जोड़तोड़ के माहिर रहे भजन लाल के वर्ष 2007 में कांग्रेस से मतभेद केचलते उन्होंने कांग्रेस छोड़कर अपनी नई पार्टी हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) बनाई थी।
वर्ष 1980 में जनता पार्टी के सभी विधायकों का कांग्रेस में दलबदल करवाने के बाद भजनलाल कांग्रेस से जुड़े थे। 2008 में कांग्रेस ने भजनलाल को पार्टी से निलंबित कर दिया। उनके छोटे बेटे चंद्रमोहन बिश्नोई कांग्रेस के साथ रहे और उन्हे प्रदेश का उप मुख्यमंत्री भी बनाया गया। जबकि बड़े बेटे कुलदीप बिश्नोई हजकां के बैनर तले आगे चलते रहे। वर्ष 2014 के लोकसभा और विधानसभ चुनाव में हजकां को कोई खास कामयाबी नहीं मिली। जिसपर करीब 9 साल बाद वर्ष 2016 में विधायक कुलदीप बिश्नोई ने हजकां का कांग्रेस में विलय करवा दिया।
उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई भी आज विधायक है। बेटे भव्य बिश्नोई की एंट्री कुलदीप बिश्नोई ने 2019 के लोकसभा चुनाव से करवाई थी, मगर भव्य अपना पहला चुनाव हार गए। कुलदीप विधानसभा चुनाव में परिवार संग फिर से डट गए हैं।
इन कुनबों ने भी सियासत को सींचा
हरियाणा की सियासत में राव परिवार का भी अहीरवाल बेल्ट में दबदबा है। सांसद एवं केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत के दादा, राव बलबीर सिंह 1926, 1930 व 1937 में संयुक्त पंजाब काउंसिल के सदस्य थे। जबकि पिता राव वीरेंद्र सिंह प्रदेश के सीएम रह चुके हैं। बुआ सुमित्रा देवी भी 1967 व 1968 में रेवाड़ी से विधायक रही। राव इंद्रजीत खुद कई बार सांसद रहे चुकेहैं और आज केंद्र में मंत्री हैं। इसी तरह सुरजेवाला परिवार भी राजनीति में सक्रिय है।
पांच बार के विधायक व एक बार सांसद रहे शमशेर सिंह सुरजेवाला प्रदेश के कृषि व सहकारिता मंत्री रह चुके हैं और अब उनकी राजनीति विरासत को रणदीप सुरजेवाला आगे बढ़ा रहे हैं। रणदीप खुद प्रदेश के मंत्री रहे चुकेहैं और आज भी विधायक है। इसी तरह चार बार के सांसद रहे चौधरी दलबीर सिंह की सियासी विरासत को उनकी बेटी कुमारी सैलजा आगे बढ़ा रही हैं। सैलजा भी चार बार की सांसद और केंद्र में मंत्री रह चुकी हैं। लेकिन वर्ष 2019 का लोकसभा चुनाव सैलजा हार गई थी। वे आज राज्यसभा में सदस्या और हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष हैं।
