जीवन के कुरुक्षेत्र में गोविंद के गीत

मानव-सृष्टि के आदि में परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से नि:सृत ‘अविनाशी योग’ का उपदेश सर्वप्रथम सूर्यदेव को दिया गया। तत्पश्चात सूर्यदेव ने इसे स्वयंभू आदिमनु को दिया। और फिर कालान्तर में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रियभक्त गाण्डीवधारी वीर अर्जुन के माध्यम से जगत कल्याण व संसार के बंधन में पड़े हुए जीवात्माओं के उद्धार के लिये श्रीमद्भगवद्गीता का यह अमर व परम पावन संदेश धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र के युद्ध-स्थल में दिया। तब से भगवान द्वारा उपदिष्ट यह आदिज्ञान रूपी गंगा की अविरल धारा जनमानस के पटल पर अक्षुण्ण रूप से प्रवाहित हो रही है तथा संसार के समस्त जीवों के चित्तरूपी दर्पण का मार्जन करने में सार्थक सिद्ध हो रही है।
वास्तव में यह मानव शरीर ही एक क्षेत्र (कुरुक्षेत्र का युद्ध-स्थल) है। ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयतेÓ’ जीवात्मा इस क्षेत्र में पाप व पुण्य कर्मों का बीजारोपण अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए करता है, जो उसके अच्छे व बुरे संस्कार के रूप में प्रस्फुटित होता है। इस प्रकार जीवात्मा जीवन भर संघर्षरत रहता है और अपने अच्छे व बुरे कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में मूल रूप से पांच विषयों की विशद व्याख्या की गयी है। आत्मा, ब्रह्म, प्रकृति, काल और कर्म। आत्मा का परमात्मा से क्या संबंध है, इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है :
“ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। मन:षष्ठानीन्िद्रयाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति”।।
अर्थात् भगवान कहते हैं कि ‘इस देह में जीवात्मा मेरा सनातन अंश है और वही इस त्रिगुणमयी (प्रकृति के तीन गुण) माया में स्थित मन और पांचों इंद्रियों को आकर्षित करता रहता है। ब्रह्म का सच्चिदानन्द स्वरूप है, जो सत्य नित्य, ज्ञानस्वरूप व आनंद प्रदान करने वाला है, वहीं आत्मा भगवान का अंश होने के नाते शाश्वत व पुरातन है, इसका भी किसी काल में न जन्म होता है न मरण।
जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अधैर्य को प्राप्त हो अपने कर्मपथ से विमुख होने की चेष्टा कर रहे थे, तो भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता रूपी अमरवाणी से उनका उचित मार्गदर्शन किया और मोह भंग होते ही वह अपना वीरोचित कर्म करने के लिए तैयार हो गये।
इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि श्रीमद्भगवद्गीता एक पावन व पवित्र ग्रंथ ही नहीं, बल्कि एक दिव्योषधि है जो हमारे अंदर व्याप्त बुराई रूपी व्याधियों को समूल नष्ट कर सद्गुणों का विकास करती है। हमें नयी दिशा प्रदान कर सत्कर्मों की अोर प्रेरित करती है। श्रीमद्भ्ागवद्गीता जीवन में हमें इंद्रिय संयम, निरंतर चिंतन अौर ध्यान की अोर अग्रसर होने के लिए प्रेरणा प्रदान करती है।
अाजकल प्राय: यह देखा गया है कि ज्यादातर युवा वर्ग व बच्चे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं रहते अौर रोगों का शिकार हो जाते हैं। श्रीमद्भ्ावगद्गीता में यह भी उल्लेखित है कि हमारा अाहार कैसा होना चाहिए। जिसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है :
अायु: सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धना:।
रस्या: स्निग्धा: स्थिरा हृद्या अाहारा: सात्त्िवकप्रिया:।।
यानी अायु, बुद्धि, बल, अारोग्य, सुख अौर प्रीति को बढ़ाने वाले रसयुक्त, चिकने अौर स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय लगने वाले भोज्य पदार्थ सात्विक जीव को प्रिय होते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जब भी हम अपना अाहार लें, तो यह निश्चित कर लें कि उसमें उपरोक्त सभी वस्तुअों का समावेश है या नहीं। इस प्रकार हम रोगमुक्त स्वस्थ जीवनयापन कर सकते हैं।
श्रीमद्भ्ागवद्गीता हमें यह प्रेरणा भी देती है कि एक शिष्य का अाचरण कैसा होना चाहिए व उसे अपने गुरु से ज्ञान अर्जित करने के लिए किस प्रकार जिज्ञासा करनी चाहिए। इस तथ्य की पुष्टि गीता में इस प्रकार हुई है :
‘कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता:।
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’।।
अर्जुन ने भगवान से विनती की- भगवन, कृपण दुर्बलता के कारण मेरा मन अधीर हो गया है। मैं मोहग्रस्त हो गया हूं। कृपया एेसे समय में मेरे लिए क्या श्रेयस्कर है, यह निश्चित रूप से बताने की कृपा करें। मैं अब अापका शिष्य हूं तथा अापकी शरण में हूं। इस प्रकार भगवान ने तब तक अर्जुन का मार्गदर्शन नहीं किया जब तक उन्होंने भगवान को गुरु के रूप में स्वीकार नहीं किया अौर शरणागत नहीं हुए। दैनिक जीवन में भी हमें गीता से यही प्रेरणा मिलती है कि हमें अगर ज्ञान अर्जित करना है तो गुरु के शरणागत होना पड़ेगा।
