भाजपा के लिए सांसद का परफॉर्मेंस तो कांग्रेस के लिए असंतोष सबसे बड़ी चिंता

उत्तर गुजरात में इस बार 2014 जैसी मोदी लहर नहीं हैं। भाजपा के लिए यहां की चार सीटों को बचा पाना बड़ी चुनौती है। पाटीदार, ठाकोर और चौधरी बाहुल्य वाली चारों सीटों पर भाजपा-कांग्रेस ने एक ही जाति के उम्मीदवारों को टिकट दिया है। भाजपा नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर और कांग्रेस बेरोजगारी, पानी और मोदी सरकार की असफलता के आधार पर वोट मांग रही है।

महेसाणा: गढ़ में सेंध सबसे बड़ी चुनौती 
इस सीट को भाजपा का गढ़ माना जाता है। भाजपा ने पूर्व मंत्री और विधायक स्व. अनिल पटेल की पत्नी को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस ने चाणस्मा विधानसभा तथा पाटण जिला पंचायत का चुनाव लड़ चुके एजे पटेल को टिकट दिया है। सामाजिक कार्यों की वजह से एजे पटेल की जनता में अच्छी पहचान है। हार्दिक पटेल की सभाएं आयोजित करके कांग्रेस पाटीदार मतों को हासिल करने का प्रयास कर रही है। भाजपा इस सीट पर कोई चुनौती नहीं मान रही है, पर 2014 जैसी लीड मिलेगी या नहीं यह बड़ा सवाल है। 

साबरकांठा: खेडब्रह्मा-भिलोडा निर्णायक 
कांग्रेस ने मोडासा के मौजूदा विधायक राजेंद्रसिंह ठाकोर को टिकट देकर मुकाबले को रोचक बना दिया है। भाजपा ने सांसद दीपसिंह राठौड़ को फिर से मौका दिया है। दीपसिंह पर पांच साल में कोई काम न करने का आरोप भाजपा की जीत में रोड़ा बन रहा है। भाजपा दावा कर रही है कि दीपसिंह ने पांच साल में साबरकांठा में 18.30 और अरावली में 7.86 करोड़ की ग्रांट विकास पर खर्च की है। उधर, कांग्रेस में भी असंतोष कम नहीं है। अरावली के राजेंद्रसिंह ठाकोर को टिकट दिए जाने से साबरकांठा के विधायकों में भारी नाराजगी है। साबरकांठा-अरावली में मतों का विभाजन होना निश्चित है। ऐसी स्थिति में दो आदिवासी सीटें खेडब्रह्मा और भिलोडा निर्णायक हो सकती हैं। ये दोनों सीटें कांग्रेस के कब्जे में हैं। 

पाटण: भाजपा के लिए "पहचान' का सवाल 
पाटण सीट पर भाजपा के लिए कड़ी चुनौती है। नए उम्मीदवार भरतसिंह डाभी की पहचान और सांसद लीलाधर की असफलता सबसे बड़ी परेशानी है। कांग्रेस ने पूर्व सांसद जगदीश ठाकोर को टिकट देकर भाजपा की मुश्किल और बढ़ा दी है। कांग्रेस के भीतर असंतोष बढ़ा है। भाजपा के उम्मीदवार खेरालू के हैं, उनके लिए यह क्षेत्र बिलकुल नया है। कैबिनेट मंत्री दिलीप सिंह ठाकोर इस क्षेत्र में भाजपा का चेहरा हैं। भाजपा मोदी के बाद यहां के वोट के लिए इन्हीं पर निर्भर है। राधनपुर के एक व्यापारी ने कहा कि जीएसटी और नोटबंदी के असर से इनकार नहीं कर सकते। 

बनासकांठा: कांग्रेस को भटोण का सहकार 
कांग्रेस ने भाजपा के सहगोत्र वाले बनासडेरी के पूर्व चेयरमैन परथीभाई भटोण को टिकट देकर मास्टर स्ट्रोक लगाया है। थराद के विधायक और मंत्री परबत पटेल से परथीभाई का मुकाबला होगा। परथीभाई 24 साल तक बनासडेरी के चेयरमैन और मंत्री रह चुके हैं। सहकारी क्षेत्र पर उनकी अच्छी पकड़ है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल डीसा और थराड की सीट पर जीत मिली थी। नर्मदा के पानी से अब रेगिस्तान में भी हरियाली दिखाई देने लगी है। किसान इस जद्दोजहद के पीछे साहब (परबत पटेल) का प्रताप मानते हैं। वाव में लोगों द्वारा मंत्री शंकर चौधरी को नकारने के बाद परिस्थिति कांग्रेस के अनुकूल बन रही है। 

महेसाणा: 4.50 लाख पाटीदार, चार लाख ठाकोर-क्षत्रिय वोट 
यहां जीत का आधार 4.50 लाख पाटीदार वोटों पर है। 4 लाख ठाकोर-क्षत्रिय और 2 लाख दलित वोट भी हैं। पाटण, सिद्धपुर, राधनपुर कांग्रेस, वडगाम निर्दलीय, चाणस्मा, कांकरेज और खेरालू भाजपा के पास हैं। 

साबरकांठा :विधानसभा की सात में से चार सीटें कांग्रेस के पास हैं 
इस सीट पर ठाकोर-क्षत्रिय जाति के 6 लाख मतदाता हैं। भाजपा-कांग्रेस ने एक ही जाति के उम्मीदवार को टिकट दिया है। यहां की सात विधानसभा सीटों में से चार कांग्रेस के कब्जे में है। कांग्रेस चार विधानसभा सीटों के आधार पर जीत का दावा कर रही है। 

पाटण: ठाकोर मत निर्णायक हैं अब अल्पेश भी कांग्रेस छोड़ चुके 
राधनपुर के विधायक अल्पेश ठाकोर अब कांग्रेस से अलग हो गए हैं। जगदीश ठाकोर को टिकट दिए जाने से कई पदाधिकारियों के नाराज होकर इस्तीफा देने की नौबत आ गई थी। इससे कांग्रेस में सब कुछ ठीक होने की पोल खुल गई थी। 

बनासकांठा: यहां ठाकोर और चौधरी वोट होंगे निर्णायक 
बनासकांठा में ठाकोर समाज के 3 लाख मतदाता हैं। 2 लाख वोटर्स के साथ चौधरी समाज दूसरे स्थान पर है। आदिवासी, दलित और रबारी समाज के करीबन 4.50 लाख मतदाता हैं। ठाकोर समाज अलग-अलग तीन हिस्सों में बंटा है। यहां ठाकोर और चौधरी वोट निर्णायक रहे हैं। 

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