पडोसियों ने कहा- हंसराज हंस ने कभी धर्म नहीं बदला, दलित परिवार से ही हैं

उत्‍तर पश्चिमी दिल्‍ली सीट से चुनाव लड़ र‍हे सूूूूफी गाय‍क हंसराज हंस के धर्म बदलने और उनके दलित होने के  विवाद में पंजाब में उनके पड़ोसी व रिश्‍तेदार खुलकर उनके समर्थन में सामने आए हैं। उनका कहना है कि हंसराज हंस ने कभी धर्म नहीं बदला और इस बारे में दुष्‍प्रचार किया जा रहा है। वह दलित परिवार में पैदा हुए और हमेशा से दलित हैं।   

हंसराज हंस का जन्‍म जालंधर से 28 किलोमीटर दूर स्थित सोफी पिंड के एक दलित परिवार में हुआ था। पंजाब के राज गायक हंसराज हंस के पांच साल पहले इस्लाम धर्म अपनाने की चर्चाएं चली थीं। यह उसी समय गलत साबित हुआ था। दरअसल, हंसराज हंस 2014 -15 में एक प्रोग्राम केे लिए पाकिस्तान गए थे। इस दौरान  पाकिस्‍तानी मीडिया के हवाले से कह दिया गया कि हंस ने वहां इस्‍लाम अपना लिया है।

हंसराज हंस का गांव का पुश्‍तैनी मकान। 

वहांं से लौटने के बाद हंसराज हंस ने साफ किया कि उन्‍होंने इस्‍लाम नहीं अपनाया है और ऐसी अफवाहें शरारत के तहत फैैैैलाई जा रही है। वहां से लौटने के बाद जालंधर में दैनिक जागरण से बातचीत में हंस ने  स्पष्ट किया था कि उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया है। यह पाकिस्तानी मीडिया का प्रोपेगंडा था। उन्होंने कभी भी इस्लाम धर्म कबूल नहीं किया है। वह सूफी सिंगर हैं और कलाकार का कोई जाति धर्म नहीं होता है। वह तो पूरी दुनिया में अमन और शांति का पैगाम बांटते हैं ।

दलित परिवार में हुआ हंस का जन्म

गांव सोफी पिंड के निवासियों का कहना है कि हंसराज हंंस का जन्‍म दलित परिवार में हुआ था। उनके धर्म बदलने की बात पूरी तरह गलत है। पड़ोसियों ने बताया कि बचपन से ही तुम्बी बजाना हंस का शौक था। गांव के ही प्राइमरी स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा लेने के बाद हंस ने आगे की पढ़ाई जालंधर के डीएवी कॉलेज में की। यूथ फेस्टिवल में हंस को पहली बार मंच मिला। इसके बाद जालंधर से ही हंस के संगीत की दुनिया का सफर शुरू हुआ।

 

हंसराज हंस की पड़ोसी जीत कौर।

हंसराज हंस की पड़ोसी जीत कौर बताती हैं कि हंस ने कभी इस्लाम धर्म नहीं कबूल किया। आज भी गांव में हंस का पुश्तैनी घर है। हंस के रिश्तेदार परमजीत बताते हैं की सबसे बड़े भाई हरबंस लाल, दूसरे नंबर पर हंसराज, तीसरे भाई अमरीक सिंह तथा चौथे भाई परमजीत हंस हैं। हंस के भाई अमरीक सिंह दो बार सरपंच भी रह चुके हैं । पिता अर्जुन सिंह व मां अजीत कौर के साथ ही हंस की परवरिश हुई थी। शिरोमणि काली दल से 2009 में जालंधर से लोकसभा चुनाव लड़े और हारने  के बाद हंस ने फिर से संगीत की दुनिया में व्‍यस्‍त हो गए। 

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