यहां गांव-गांव में मशहूर है ‘अक्ती’ संस्कार, बचपन में ही पढ़ा देते वैवाहिक संस्कार

रायपुर। शादी-ब्याह के मौके पर अक्सर देखा जाता है कि शहरी युवतियों को विवाह में होने वाली कुछ रस्मों की ही जानकारी होती है, ज्यादातर रस्मों के बारे में उन्हें पता ही नहीं होता। इसके विपरीत छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में प्रायः सभी युवतियों को वैवाहिक रस्मों की पूरी जानकारी होती है। इसका कारण है कि साल में एक दिन अक्षय तृतीया पर गांव-गांव में छोटी बच्चियां अपने गुड्डा-गुड़िया का ब्याह अवश्य रचाती हैं।

मिट्टी से बने गुड्डा-गुड़िया का ब्याह रचाते वक्त परिवार के लोग मिलकर वे सारी रस्में निभाते हैं, जो रस्में सचमुच की शादी में निभाई जाती है। चार-पांच साल की उम्र से लेकर 10 साल की होते तक बच्चियां अपने गुड्डा-गुड़िया का ब्याह रचाते-रचाते हर तरह की रस्मों से वाकिफ हो जाती हैं। सदियों से चली आ रही इस परंपरा के चलते आधुनिक दौर में आज भी गांव-गांव में शादियों के वक्त निभाई जाने वाली रस्मों में युवतियों, महिलाओं के अलावा बच्चियां भी पूरे उत्साह से शामिल होती हैं।घर-गृहस्थी का ज्ञान

सदियों पहले जब छत्तीसगढ़ में लड़कियों को स्कूली शिक्षा नहीं दी जाती थी तब बुजुर्गों का मानना था कि एक न एक दिन लड़कियों को ससुराल जाना ही है और घर-गृहस्थी संभालनी है तो क्यों न रस्मों के बारे में सारी जानकारी दी जाए, ताकि समझदार होने के बाद लड़कियां अपना घर-परिवार बेहतर ढंग से चला सकें।
अबूझ और महामुहूर्त है पुण्य फलदायी

बिना पंचांग देखे ही महामुहूर्त मानी जानी वाली अक्षय तृतीया को छत्तीसगढ़ में 'अक्ती' के रूप में जाना जाता है। गांव वालों के सामने यदि अक्षय तृतीया कहा जाए तो कम लोग ही समझेंगे, लेकिन यदि अक्ती कहें तो हर कोई समझ जाएगा। माता-पिता अपने विवाह योग्य संतानों का विवाह इस दिन पंडितों, पुजारियों से पूछे बिना ही तय कर देते हैं। वे जानते हैं कि यह अबूझ यानी महामुहूर्त है। इस मुहूर्त में कोई भी कार्य करने से वह पुण्यदायी और फलदायी होता है।
सबसे बड़ा दान कन्यादान

छत्तीसगढ़ी पूजा-पाठ, संस्कृति के ज्ञाता पं.मनोज शुक्ला बताते हैं कि भारतीय संस्कृति में दान का बड़ा महत्व माना गया है। इसमें खासकर कन्यादान को सबसे बड़ा दान कहा गया है। ऐसी मान्यता है कि जिसने कन्यादान नहीं किया उसका पारिवारिक जीवन सार्थक नहीं है। यही कारण है कि जिस घर में कन्या न हो उस परिवार के लोग किसी दूसरी कन्या को गोद लेकर कन्यादान करके पुण्य फल कमाते हैं।
आज भी जीवित है परंपरा

गांव में ऐसी परंपरा है कि जिसके बेटा नहीं है, वह गुड्डा की बारात लेकर उस व्यक्ति के घर जाता है, जिसके कन्या नहीं होती। कन्याहीन माता-पिता बारात का स्वागत करके उसके गुड्डे के साथ अपनी गुड़िया का ब्याह रचाते हैं। इसमें रिश्तेदार, गांव वाले जोशोखरोस से शामिल होते हैं। आज भी कई गांवों में यह परंपरा जीवित है।
इन वैवाहिक संस्कारों की देते हैं सीख

गुड्डा-गुड़िया का ब्याह रचाते समय दोनों पक्ष के लोग बाकायदा तालाब से चूलमाटी लेने जाते हैं। देवी-देवता को प्रतिष्ठापित करते हैं, आमपत्ता, डुमर पेड़ के पत्तों से मंडपाच्छादन यानी मंडप सजाते हैं। इसके बाद गुड्डा-गुड़िया को तेल, हल्दी चढ़ाने की रस्म निभाते हैं। देवतला अर्थात देवगणों को न्योता भी दिया जाता है।

समारोह में आने वाले रिश्तेदार, परिचितों के माथे पर हल्दी तिलक यानि चीकट हरदाही की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद मंत्रोच्चार के साथ सात फेरे, कन्यादान, समधि-समधन भेंट, बिदाई आदि रस्मों को पूरा किया जाता है।

निमंत्रण पत्र बांटकर होने लगा रिसेप्शन

गांवों की यह परंपरा अब शहरों में भी धूमधाम से मनाई जाने लगी है। राजधानी में बंजारी चौक पर होने वाले सामूहिक आयोजन में बकायदा गुड्डा-गुड़िया के शादी के निमंत्रण पत्र छपवाए जाते हैं। पूरे मोहल्ले को आमंत्रित करके शादी की रस्म निभाकर भव्य रिसेप्शन में सचमुच की शादी की तरह खानपान का आयोजन भी होने लगा है।
 

Leave a Reply