HDFC बैंक पर गंभीर सवाल: ‘मार्केटिंग खर्च’ के नाम पर करोड़ों का खेल?

*चेयरमैन के इस्तीफे के बाद खुला मामला
भोपाल। मार्च 2026 में HDFC बैंक के तत्कालीन चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने “नैतिकता और मूल्यों” का हवाला देते हुए अचानक इस्तीफा दे दिया था। उस समय RBI की ओर से किसी बड़ी कार्रवाई या सख्त जांच की बजाय सब कुछ सामान्य बताया गया। लेकिन अब सामने आई रिपोर्ट ने बैंक की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
रिपोर्ट के मुताबिक, HDFC बैंक ने महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (MSRDC) को ज्यादा ब्याज देने के लिए करोड़ों रुपये को “मार्केटिंग” और “स्पॉन्सरशिप” खर्च के रूप में दिखाया। आरोप है कि यह पूरा भुगतान नियमों से बचने और अतिरिक्त ब्याज छिपाने के लिए किया गया।
कैसे हुआ पूरा मामला?
* वर्ष 2021 में HDFC बैंक ने MSRDC से लगभग ₹25,000 करोड़ की जमा राशि हासिल करने के लिए बातचीत शुरू की।
* MSRDC ने कहा कि उसे पहले से 6% ब्याज मिल रहा है।
* इसके बाद HDFC बैंक 6.01% ब्याज देने को तैयार हो गया, जबकि आम ग्राहकों को लगभग 3.5% ब्याज मिल रहा था।
* आरोप है कि बैंक ने इसके अलावा 2.51% अतिरिक्त लाभ देने की भी व्यवस्था की, लेकिन इसे सीधे ब्याज के रूप में नहीं दिखाया गया।
‘रोड सेफ्टी कैंपेन’ के नाम पर भुगतान
बताया गया है कि FY 2023-24 और FY 2024-25 के दौरान करीब ₹45 करोड़ की अतिरिक्त राशि “रोड सेफ्टी अवेयरनेस कैंपेन” के नाम पर चार स्थानीय वेंडर्स के जरिए MSRDC तक पहुंचाई गई। इस भुगतान को मार्केटिंग और स्पॉन्सरशिप खर्च के रूप में दर्ज किया गया।
RBI नियमों के उल्लंघन के आरोप
RBI के नियमों के अनुसार बैंक किसी विशेष ग्राहक को ऐसी अलग और विशेष ब्याज दर नहीं दे सकते, जो अन्य ग्राहकों को उपलब्ध न हो। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि MSRDC को विशेष लाभ दिया गया, जो बैंकिंग नियमों के खिलाफ माना जा सकता है।
बिना लिखित मंजूरी के फैसले?
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस पूरी प्रक्रिया में कोई औपचारिक लिखित मंजूरी, कानूनी राय या कंप्लायंस समीक्षा नहीं हुई। कथित तौर पर बैंक के शीर्ष अधिकारियों ने मौखिक स्वीकृति देकर प्रक्रिया आगे बढ़ाई। जांच में शामिल अधिकारियों ने माना कि मार्केटिंग खर्च के जरिए अतिरिक्त ब्याज को “छिपाने” की कोशिश की गई।
बैंकिंग गवर्नेंस और राजनीति पर उठे सवाल
इस खुलासे के बाद बैंक की आंतरिक पारदर्शिता, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और नियामक निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं। महाराष्ट्र में पहले भी बैंकिंग और वित्तीय अनियमितताओं के मामले सामने आते रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर भी बहस तेज हो गई है।
