3 महीने के मासूम की सर्जरी में चौंकाने वाला खुलासा, पेट से निकला ‘जुड़वां बच्चा’

बरेली: चिकित्सा जगत और मानव शरीर की जटिल संरचना से जुड़ा एक ऐसा हैरान कर देने वाला दुर्लभ मामला उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से सामने आया है, जिसे देखकर बड़े-बड़े डॉक्टर भी दंग रह गए हैं। शहर के रामपुर गार्डन स्थित विदुराज अस्पताल के वरिष्ठ और अनुभवी डॉक्टरों की टीम ने एक अविश्वसनीय और बेहद जटिल ऑपरेशन को अंजाम दिया है।

चिकित्सकों ने मात्र तीन महीने की उम्र के एक मासूम बच्चे के पेट के भीतर पल रहे एक और अजन्मे अविकसित भ्रूण को अत्यंत सावधानीपूर्वक सर्जरी के जरिए बाहर निकालने में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। राहत की सबसे बड़ी बात यह है कि इस बेहद नाजुक और चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन के सफल होने के बाद अब वह नन्हा बच्चा पूरी तरह से खतरे से बाहर और स्वस्थ है।

शाहजहांपुर से बरेली पहुंचा था मासूम; पेट में मोटी गांठ समझकर चल रहा था इलाज, जांच में उड़े होश

बरेली: यह हैरान कर देने वाला मामला मूल रूप से उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के कलान क्षेत्र का है:

  • पेट में सूजन ने बढ़ाई चिंता: तीन महीने के इस मासूम बच्चे के माता-पिता ने देखा कि उनके बच्चे का पेट सामान्य से अधिक फूल रहा है और छूने पर वहां एक सख्त, मोटी गांठ जैसा महसूस हो रहा है। असहजता और दर्द के कारण बच्चा लगातार रो रहा था।

  • स्थानीय स्तर पर नहीं मिला इलाज: चिंतित परिजनों ने पहले शाहजहांपुर के स्थानीय डॉक्टरों को दिखाया, जिन्होंने स्थिति को गंभीर भांपते हुए उन्हें तुरंत बरेली के किसी बड़े अस्पताल (हायर सेंटर) ले जाने की सलाह दी।

  • जांच रिपोर्ट में हुआ चौंकाने वाला खुलासा: परिजन जब बच्चे को लेकर बरेली पहुंचे, तो डॉक्टरों ने उसकी बीमारी की असल वजह जानने के लिए अल्ट्रासाउंड और हाई-रिजॉल्यूशन सिटी स्कैन (CT Scan) जैसी गहन जांचें कराईं। इन जांचों की रिपोर्ट जब सामने आई, तो स्वयं डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पाए। बच्चे के पेट में कोई साधारण गांठ या ट्यूमर नहीं था, बल्कि वहां एक अविकसित इंसानी भ्रूण (फिटस) मौजूद था, जिसे केवल सर्जरी के जरिए ही बाहर निकाला जा सकता था।

पीडियाट्रिक सर्जन की कमी से घबराए परिजन; दिल्ली के बजाय विदुराज अस्पताल के डॉक्टरों पर जताया भरोसा

बरेली: इस गंभीर बीमारी का पता चलने के बाद पीड़ित परिवार के सामने एक नई और बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई:

  • दिल्ली जाने की मिली थी सलाह: बरेली के जिस निजी मेडिकल कॉलेज में बच्चे की प्रारंभिक जांचें हुईं, वहां बच्चों की सर्जरी करने वाले विशेषज्ञ यानी पीडियाट्रिक सर्जन (Pediatric Surgeon) उपलब्ध नहीं थे। डॉक्टरों ने परिवार को बिना समय गंवाए बच्चे को दिल्ली के किसी बड़े सुपर स्पेशलिटी अस्पताल ले जाने की सलाह दी।

  • रामपुर गार्डन में मिली राहत की किरण: दिल्ली जाने की आर्थिक और व्यावहारिक दिक्कतों से जूझ रहे परिजन बुधवार को हताश होकर रामपुर गार्डन स्थित विदुराज अस्पताल पहुंचे। यहां के वरिष्ठ सर्जन डॉ. राजीव अग्रवाल ने जब बच्चे की पुरानी जांच रिपोर्ट और सिटी स्कैन प्लेट्स का बारीकी से अध्ययन किया, तो उन्होंने तुरंत बच्चे के पेट में पल रहे इस परजीवी भ्रूण की पहचान कर ली। बच्चे की लगातार गिरती हालत को देखते हुए डॉ. अग्रवाल ने दिल्ली रेफर करने के बजाय खुद ही बरेली में इस चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन को करने का साहसिक निर्णय लिया।

रक्त का इंतजाम और गुरुवार की रात हुई जीवनदायिनी सर्जरी; सफलतापूर्वक निकाला गया बाहर

बरेली: इतने छोटे बच्चे की बड़ी सर्जरी करना हमेशा से ही डॉक्टरों के लिए अत्यधिक जोखिम भरा होता है, क्योंकि इसमें खून के अत्यधिक रिसाव और एनेस्थीसिया (बेहोशी) का बड़ा खतरा रहता है:

  • की गई विशेष तैयारी: सर्जरी शुरू करने से पहले डॉक्टरों की टीम ने बच्चे के ब्लड ग्रुप का मिलान कर पर्याप्त मात्रा में रक्त (ब्लड) का इंतजाम किया।

  • घंटों चली जटिल सर्जरी: गुरुवार की रात डॉ. राजीव अग्रवाल और उनकी विशेष एनेस्थीसियोलॉजिस्ट टीम की देखरेख में बच्चे को ऑपरेशन थिएटर में लिया गया। कई घंटों तक चली इस बेहद जटिल और संवेदनशील सर्जरी के बाद डॉक्टरों ने बच्चे के पेट के भीतर से उस अविकसित परजीवी भ्रूण को बिना किसी आंतरिक अंग को नुकसान पहुंचाए सुरक्षित बाहर निकाल लिया। ऑपरेशन सफल होते ही डॉक्टरों और बाहर इंतजार कर रहे परिजनों ने राहत की सांस ली।

क्या है यह दुर्लभ बीमारी? पांच लाख बच्चों में से किसी एक में पाया जाता है 'फीट्स इन फेटू'

बरेली: इस विस्मयकारी मेडिकल केस पर रोशनी डालते हुए विदुराज अस्पताल के वरिष्ठ सर्जन डॉ. राजीव अग्रवाल ने इसके पीछे के वैज्ञानिक और जैविक कारणों को विस्तार से समझाया है:

  • क्या है 'फीट्स इन फेटू' (Fetus in Fetu): चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इस अत्यंत दुर्लभ स्थिति को 'भ्रूण के अंदर भ्रूण' या परजीवी जुड़वा (Parasitic Twin) कहा जाता है।

  • कोशिकाओं का गलत विभाजन: डॉ. अग्रवाल के अनुसार, जब कोई महिला गर्भवती होती है, तो गर्भधारण के शुरुआती छह से बारह सप्ताह के भीतर भ्रूण के विकास की प्रक्रिया चल रही होती है। इस दौरान कई बार गर्भ में जुड़वा बच्चों के बनने की प्रक्रिया में कोशिकाएं (Cells) असमान रूप से विभाजित हो जाती हैं। इस असामान्य विभाजन के कारण एक कमजोर और अविकसित रह गया भ्रूण, दूसरे स्वस्थ और तेजी से विकसित हो रहे भ्रूण के शरीर के भीतर ही समाहित हो जाता है।

  • दुनियाभर में केवल 300 मामले: शरीर के अंदर समा जाने के कारण इस अविकसित भ्रूण के मस्तिष्क और अन्य अंगों का विकास पूरी तरह रुक जाता है, लेकिन यह अंदर ही अंदर एक गांठ का रूप ले लेता है। चिकित्सा इतिहास के अनुसार, पूरी दुनिया में पांच लाख (5,00,000) जीवित जन्म लेने वाले बच्चों में से किसी एक बच्चे में ही ऐसा दुर्लभ संयोग देखने को मिलता है। अब तक के वैश्विक चिकित्सा इतिहास में ऐसे केवल 300 के करीब मामले ही दर्ज किए गए हैं।

बरेली के इतिहास का यह दूसरा सबसे बड़ा चमत्कार; डॉ. राजीव ने ही 2010 में भी किया था ऐसा ही सफल ऑपरेशन

बरेली: डॉक्टरों का दावा है कि रुहेलखंड और बरेली संभाग के चिकित्सा इतिहास में ऐसा दुर्लभ मामला दूसरी बार सामने आया है, और दोनों ही बार सफलता का श्रेय एक ही डॉक्टर को जाता है:

  • 16 साल पहले भी किया था चमत्कार: डॉ. राजीव अग्रवाल ने बताया कि इससे पहले वर्ष 2010 में भी उनके पास हूबहू ऐसा ही एक दुर्लभ केस आया था, जिसमें उन्होंने एक बच्चे के पेट से अविकसित भ्रूण निकालकर उसे नया जीवन दिया था।

  • चिकित्सा जगत में गौरव की बात: बरेली जैसे शहर में बिना महानगरों (जैसे दिल्ली या मुंबई) की मदद के इतनी जटिल बाल सर्जरी का सफलतापूर्वक संपन्न होना यहां के स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर और डॉक्टरों की उच्च प्रतिभा का एक बेजोड़ उदाहरण है। फिलहाल डॉक्टरों की देखरेख में नवजात तेजी से रिकवर कर रहा है और जल्द ही उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी।

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