ब्राह्मणवाद पर टिप्पणी से मचा बवाल, नेहा बोरा के समर्थन और विरोध में सियासत तेज

नई दिल्ली। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा सनातन धर्म, धार्मिक संस्थानों और तथाकथित "ब्राह्मणवादी व्यवस्था" को लेकर दिए गए विवादित बयानों के बाद राष्ट्रीय राजनीति में भूचाल आ गया है। इस तीखे बयानों के चलते उन्हें भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना समेत एनडीए के तमाम प्रमुख नेताओं के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। सत्ताधारी दल के नेताओं ने उन पर सीधे तौर पर हिंदू धर्म और उसकी मान्यताओं को अपमानित करने का गंभीर आरोप लगाया है, साथ ही लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर भी ऐसे बयानों का समर्थन करने तथा वामपंथी नेताओं को बड़ा राजनीतिक मंच उपलब्ध कराने को लेकर तीखे सवाल दागे हैं।

भाजपा नेताओं का कड़ा प्रहार और राहुल गांधी पर निशाना

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने इस पूरे प्रकरण पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आइसा अध्यक्ष के बयानों में सीधे तौर पर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की वैचारिक सोच की झलक साफ दिखाई देती है। उन्होंने कांग्रेस पार्टी पर हिंदुओं के प्रति गहरी शत्रुता का भाव रखने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि इस प्रकार का विभाजनकारी रुख देश की अखंडता और एकता के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एक अन्य भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने भी कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा कि नेहा बोरा लगातार सनातन संस्कृति और उसके अनुयायियों को निशाना बनाकर आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं, जो उनकी विकृत मानसिकता को उजागर करता है। इसके अलावा, भाजपा प्रवक्ता गुरु प्रकाश पासवान ने भी तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि कांग्रेस ऐसे लोगों को मुख्यधारा की राजनीति में आगे बढ़ा रही है जो देश के संविधान को फासीवादी दस्तावेज करार देते हैं।

शिवसेना की आपत्ति और वामपंथी सोच पर सवाल

इस राजनीतिक विवाद में आक्रामक रुख अपनाते हुए शिवसेना नेता आनंद दुबे ने भी अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि बोरा की ऐसी टिप्पणियों पर हैरानी जताने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह उनकी मूल वैचारिक पृष्ठभूमि का ही हिस्सा है। शिवसेना नेता ने विशेष रूप से आपत्ति जताते हुए कहा कि निशाना हमेशा सनातन धर्म और हिंदू धार्मिक संस्थानों को ही क्यों बनाया जाता है, जबकि अन्य धर्मों के स्थलों पर चुप्पी साध ली जाती है। उन्होंने वामपंथी संगठनों पर आरोप लगाया कि वे सोची-समझी रणनीति के तहत समाज को धार्मिक आधार पर खंडित करने और बाहरी ताकतों के इशारे पर देश का माहौल खराब करने का प्रयास कर रहे हैं। बिहार सरकार के मंत्री संतोष सुमन ने भी इन बयानों की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे विचार देश की मूल संस्कृति के विपरीत हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रस्ताव और बयानों से उपजा विवाद

यह पूरा घटनाक्रम तब तूल पकड़ गया जब आइसा अध्यक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध लाए गए महाभियोग प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन करते हुए समाज की व्यवस्था पर आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने जातिगत भेदभाव और धार्मिक व्यवस्थाओं की आड़ में महिलाओं तथा कमजोर वर्गों के दमन का दावा करते हुए एक विशेष व्यवस्था के खिलाफ बयानबाजी की। उनके इन बयानों के सामने आने के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में वामपंथी विचारधारा और विपक्षी दलों की खामोशी को लेकर बहस छिड़ गई है, तथा विभिन्न हिंदू संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की जा रही है।

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