कच्छ, गुजरात के कुम्हारों के मिथक -ऑनलाइन प्रदर्शनी

भोपाल। इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय द्वारा अपनी ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला के उन्तीसवीं सोपान के तहत आज मिथक वीथी मुक्ताकाश प्रदर्शनी के कच्छ, गुजरात के कुम्हारों के मिथक से सम्बंधित विस्तृत जानकारी तथा छायाचित्रों एवं वीडियों को ऑनलाईन प्रस्तुत किया गया है।
इस संदर्भ में संग्रहालय के निदेशक डॉ. प्रवीण कुमार मिश्र ने बताया कि मिथक वीथी मानव संग्रहालय की एक रोचक एवं अनूठी प्रदर्शनी है जहां मिथकों और किंवदंतियों को विभिन्न माध्यमों जैसे टेराकोटा, पत्थर, धातु, लकड़ी आदि में दर्शाया गया है। मिथक का कोई मूर्त रूप नहीं होता है। इसलिए उसे हमेशा व्यक्त नहीं किया जा सकता है। इस प्रदर्शनी के मुख्य उदेश्यों में से एक उद्देश्य मिथक के अमूर्त पहलुओं को मूर्त रूपों में बदलना है ताकि जनमानस उसमें छिपे भाव को अच्छी तरह से समझ सकें। इस प्रदर्शनी में कई जनजातीय तथा लोक कलाकारों ने अपने मिथकों, मान्यताओं, अनुष्ठानों को अपने-अपने माध्यम व विशिष्ट पारम्परिक शैली में मूर्त रूप दिया है। इनमें से कुछ तो मिथकों का निरूपण करते आये है, किन्तु कई ऐसे भी है जिन्होंने पहली बार ऐसा किया है। इस संदर्भ में की गई पहल पर आधारित कहानी मानव संग्रहालय के मिथक वीथी प्रदर्शनी में देखने को मिलती है जोकि कुम्हारों के मिथक से जुडी हुई है । यहां प्रदर्शित मिट्टी के बर्तन गुजरात के कच्छ जिले के भुज तालुक के एक छोटे से गाँव खवड़ा के हैं। जोकि रण के निकट स्थित है। यहाँ पर पानी और अनाज के भंडारण के लिए विभिन्न प्रकार के मटके, तश्तरियां, बड़े थाल, कटोरे, दीयें आदि बनाए जाते हैं।
खावड़ा गांव की महिला सारा इब्राहिम विगत 40 वर्षों से मृद्भाण्ड शिल्प को जीवंत रखे हुए है। मध्यप्रदेश सरकार ने उनके मिट्टी शिल्प और बर्तनों पर चित्रकला में निरंतर रचनात्मकता कार्यों के प्रति समर्पण भाव के लिए उन्हें वर्ष 2001- 02 में देवी अहिल्या राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया। वह पिछले तीस सालों से इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय के साथ जुड़ी हुई हैं। उन्होंने समय-समय पर मानव संग्रहालय द्वारा भारत के विभिन्न हिस्सों में आयोजित कार्यशालाओं और कलाकार शिविरों में भाग लिया। वह कई बार संग्रहालय के शैक्षणिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनीं और प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया। सारा इब्राहिम के पति इब्राहिम कासम भी मिट्टी के बर्तन बनाने में कुशल हैं। ये दोनों ही शदियों से चली आ रही धरोहर को आगे बढ़ा रहे हैं । पुरुष मिट्टी को गढ़ने का काम करते हैं तथा महिलाएं बिना पहिये के प्लेट, कटोरे आदि बर्तन बनाती हैं और सजावट करती हैं।
इस सम्बन्ध में संग्रहालय एसोसिएट सुश्री पी अनुराधा ने बताया कि बर्तनों को आम तौर पर एक मोटी दीवार और तले के साथ बनाया जाता है, जबकि गर्दन और मुंह को अंत में आकार दिया जाता हैं। आधे सूखे बर्तन को अंदरूनी भाग में पत्थर की एक गोल थापी से सहारा देकर बाहरी सतह पर लकड़ी के पटटे से पीटा जाता है। जिसके पीटने से यह मिट्टी फैलती है और बर्तन को एक आकार देती है। इस प्रक्रिया से बर्तनों की दीवार भी पतली की जाती है। महिलायें सफ़ेद बाहरी सतह वाले बर्तनों पर लाल एवं काले रंग से जबकि लाल बाहरी सतह वाले बर्तनों पर काले एवं सफ़ेद रंग से चित्र बनाती है। चित्र बनाने के लिए ब्रश के रूप में बांस की टहनियों का उपयोग किया जाता है। सभी डिज़ाइनों को संकेंद्रित वृत्तों के अंदर बनाया जाता है जिसे स्थानीय रूप से “लिख” कहा जाता है। इनके अधिकांश डिज़ाइन प्रकृति से प्रेरित होते हैं जो इनकी बुनाई में भी दिखाई देते हैं।
एक दिलचस्प कहानी को कलाकार सारा इब्राहिम ने दीवार पर मिट्टी में दर्पणों के साथ कम उभरे नक्काशी कार्य के रूप में दर्शाया है, जो आम तौर पर कच्छ और काठियावाड़ के क्षेत्र में दीवारों, दरवाजों, आलों और भंडारण पात्रों में पाया जाता है। कहानी कुछ इस प्रकार से है :पुराने समय में कुम्हार के बर्तन पकने में छ:महीने लगा करते थे। एक दिन कुम्हार ने अपनी भट्टी सुलगाई ही थी कि भागते हुए कुछ किन्नर आये जिनका पीछा राजा के सैनिक कर रहे थे। जान बचाने के लिये वे कुम्हार के लाख मना करने पर भी आवे में रखे बड़े मर्तबानों में जा छिपे।राजा के लोग कुम्हार के घर की छान-बीन कर चले गये। जलते हुए आवे में किसी के छिपे होने की बात तो कोई सोच भी नहीं सकता था। आवा सुलगने के बाद थके-हारे कुम्हार की आंख लग गई। कुछ समय बाद स्वप्न में कुम्हार के कानो में आवाज पड़ी "आवे में रखे तुम्हारे बर्तन सुनहरे हो गए है" लेकिन उसने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई। फिर आवाज आयी "तुम्हारे बर्तन रुपहले हो गये" लेकिन कुम्हार ने इसे भी सुना-अनसुना कर दिया। थोड़ी देर बाद वही आवाज फिर बोली "तुम्हारे बर्तन आधे कच्चे, आधे पक्के निकले" यह सुन कुम्हार आवे की तरफ भागा और उसने पाया कि जिन बर्तनो में किन्नर छिपे हुए थे, वे कच्चे रह गए और इस तरह उनकी जान बच गयी। तब से कुम्हार का आवा एक दिन में ही पक जाता है पर कुछ बर्तन सदा कच्चे रह जाते है। कुम्हार चाहता तो अपने लिए सुनहरे या रुपहले बर्तन चुन सकता था, लेकिन उसने नुकसान झेलते हुए भी किन्नरों का जीवन बचाने को चुना। कच्छ में आज भी किन्नर,कुम्हार और उसकी पत्नी को अपने माता-पिता के रूप में मानते हैं, महत्वपूर्ण अवसरों पर उनका आशीर्वाद लेते हैं और उन्हें पैसे और कपड़े भेंट करते हैं।
