राजस्थान के बाड़मेर में आज भी जिंदा है ‘पाकिस्तानी मुक्का’, अब इंटरनेशनल मार्केट में भी मिलेगी पहचान

बाड़मेर. सिंध और हिन्द के बीच बरसो तलक बेटी और रोटी का नाता रहा, लेकिन विभाजन के बाद इसमे दुश्वारियां आईं. विभाजन के दरमियां हजारों परिवार पाकिस्तान (Pakistan) की सरहद से इस पार आ गए. वह परिवार अपने साथ वहां के हस्तशिल्प को भी लेकर आए, उनमें से एक हस्तशिल्प था "मुक्का". महीन सतरंगी धागों से बनने वाला मुक्का बरसों तलक गुमनामी में रहा, लेकिन अब वह विश्व पटल पर अपनी धूम मचाने वाला है. राजस्थान (Rajasthan) के बाड़मेर (Barmer) में आज भी पाकिस्तान की इस खास कला मुक्का को जिंदा रखा गया है.
रेतीले सिंध में विवाह के वक़्त बेटी को दिए जाने वाला सबसे खास परिधान बनता था मुक्का से. मुक्का सोने और चांदी के धागों से कपड़े पर सजता था. सिंध का यह मुक्का बरसों पहले विभाजन के वक़्त सरहद के उस पार से इस पार आ गया. बेहद मुश्किल और मेहनतकश कारीगरी को लेकर आज भी फनकार इसको बनाने में जुटे नजर आते हैं. सिंध के हुनरमंद हाथ अब हिंदुस्तानी सरजमीं पर बारीकी और मनभावन कला के साथ निपुणता से काम मे जुटे नजर आते हैं. विशेष तौर पर मुस्लिम समुदायों से जुड़ी धातुई कढ़ाई मुक्के का आधार है.
सूती धागों ने ली जगह
कभी चांदी और सोने के धातु के धागे इसमे उकेरे जाते थे, लेकिन महंगाई बढ़ने के साथ ही अब इनकी जगह सूती धागे ने ले ली. सरहदी बाड़मेर के कई गांवों में चमकीले, लाल, नारंगी, हरे, पीले, नीले और गुलाबी धागों से औरतें अपने पारंपरिक अंगिया चोली पर मुक्के को दहेज में बेटी को सबसे बड़े उपहार के रूप में दी जाती थी. बदलते दौर में ना तो इस मुक्के का कोई बाजार उपलब्ध हो पाया और ना ही इनकी मेहनत का कोई बड़ा ख़रीरदार नजर आता था. मुक्के में पारंगत जरीना बताती है कि 3-3 महीने लग जाते है मुक्के से एक परिधान बनाने में लेकिन मेहनत का परिणाम कभी पैसों में नहीं बदला.
अंतरराष्ट्रीय पहचान देने की कवायद
उपहार और पारंपरिक परिधानों तलक सीमित रहे मुक्का को अब अंतराष्ट्रीय पहचान देने की कवायद सरहदी बाड़मेर में होती नजर आ रही है. बरसों से कला, संस्कृति एवं लोकरंग के सरंक्षण में लगी समाजसेवी संस्थान श्योर ने मुक्का के संरक्षण के लिए पहल की है. श्योर ने मुक्के को पारंपरिक परिधानों से बाहर निकाल कर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में जगह दी है.सरहदी बाड़मेर में श्योर संस्थान ने बाड़मेर जिले में ना केवल विभिन्न कौशल और डिजाइन कार्यशाला का आयोजन किया. बल्कि मुक्का शिल्प में कई कारीगरों को प्रशिक्षित किया है. श्योर की सचिव लता कच्छवाह बताती हैं कि हमने आज के फैशन के अनुसार नए सामानों में मुक्के को पेश किया है. श्योर ने मुक्के को साड़ी, कुर्ती, बैग, पुशनकवर, वॉल कवर और बेडशीट सहित कई घरेलू उपयोगी वस्त्रों और उत्पादों पर उकेरा है. देश के अलग अलग जगहों के फैशन डिजाइनिंग कर रहे विद्यार्थी इन दिनों पारंपरिक मुक्के की भारी भरकम डिजाइन को आज के बाजार और आज के फैशन के अनुसार आकर्षक तरीके से बनाने का काम किया है.
