अजीब विडंबना: दिव्यांगों के प्रति अपराध में कम सजा और सामान्य के प्रति अपराध में ज्यादा

नई दिल्ली। वैसे तो निरीह लाचार और दिव्यांग (निशक्त) व्यक्ति के प्रति अपराध करने में ज्यादा सजा होनी चाहिए, लेकिन कानून में ऐसा नहीं है। दिव्यांग के प्रति अपराध में सजा कम है, जबकि वही अपराध सामान्य व्यक्ति के खिलाफ करने पर सजा ज्यादा है। दिव्यांगों को सहारा देने और सक्षम बनाने के लिए संशोधित किए गए दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 में ये कानूनी विसंगतियां हैं। इसमें कई प्रावधान ऐसे हैं, जिममें दिव्यांगों के प्रति अपराध में सजा सामान्य जन के प्रति अपराध में आइपीसी में तय सजा से कम है।

 

ये है मौजूदा कानून

 

दिव्यांग जन अधिकार कानून कहता है कि अगर कोई दिव्यांग महिला को बेइज्जत या उसका शीलभंग करने के इरादे से हमला अथवा बल का प्रयोग करता है तो उसे कम से कम छह महीने की जेल होगी जो कि बढ़कर पांच वर्ष के कारावास और जुर्माने तक हो सकती है जबकि सामान्य महिला के शीलभंग की कोशिश में आइपीसी की धारा 354 में कम से कम एक वर्ष के कारावास का प्रावधान है, जो कि बढ़कर पांच साल की कैद और जुर्माना हो सकता है।

 

इसी तरह अगर कोई व्यक्ति दिव्यांग महिला की सहमति के बगैर उसका गर्भपात करता है तो वह धारा 92(एफ) में कम से कम छह महीने की जेल का भागी होगा उसकी यह सजा बढ़ कर पांच साल का कारावास और जुर्माने तक की हो सकती है। जबकि आइपीसी की धारा 313 कहती है कि अगर कोई व्यक्ति किसी महिला की सहमति के बगैर उसका गर्भपात करता है तो वह उम्रकैद अथवा दस साल तक बढ़ाई जा सकने वाली अवधि की सजा और जुर्माने का भागी होगा। यानी यहां भी दिव्यांग के प्रति अपराध में सजा सामान्य महिला के प्रति अपराध से कम है।

 

विसंगतियों को दूर करने की मांग

 

वकील सागर शर्मा ने दिव्यांगजन अधिकार कानून 2016 की इन विसंगतियों को उजागर करते हुए कानून मंत्रालय को ज्ञापन भेज कर इसे ठीक किये जाने और दिव्यांगों के प्रति अपराध में दंड को और सख्त किये जाने की गुजारिश की है। सागर कहते है कि धारा 92 (एफ) में संशोधन होना चाहिए साथ ही अपराध को संज्ञेय और गैर जमानती बनाया जाना चाहिए। इसी तरह कानूनी विसंगतियों वाली अन्य धाराओं में भी संशोधन होना चाहिए। हालांकि कानून मंत्रालय ने उनके ज्ञापन का जवाब देते हुए कहा है कि दिव्यांगो के अधिकारों का मामला समाज कल्याण मंत्रालय के तहत आता है इसलिए उनका ज्ञापन जरुरी कार्रवाई के लिए वहीं भेज दिया गया है।

 

सजा में विसंगतियों के अलावा संशोधित कानून लागू हुए छह महीने हो गए हैं, लेकिन अभी तक इसके समथर्न में नियम तय नहीं हुए है। कितने गंभीर बीमार होने पर दिव्यांगता प्रमाणपत्र दिया जायेगा ये अभी तय नहीं है। इससे कानून में शामिल की गई दिव्यांगों की नयी श्रेणी जैसे थैलेसिमिया और हिमोफीलिया ग्रसित लोगों को दिव्यांगों को प्राप्त आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

 

कुछ लोग तो कोर्ट जाकर राहत ले रहे हैं, लेकिन ज्यादातर वंचित है। गत अगस्त में थैलेसीमिया पीडि़त एक छात्रा की सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मेडकिल बोर्ड ने जांच की और उसे गंभीर थैलेसीमिया से पीड़ित पाये जाने पर दिव्यांग आरक्षण कोटे में छत्तीसगढ़ मेडिकल कालेज में एमबीबीएस कोर्स में प्रवेश दिया गया। हालांकि इसी महीने सरकार ने प्रमाणपत्र के नियम तय करने के लिए कमेटी का गठन किया है, जिसकी रिपोर्ट का इंतजार है।

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