भारत के स्टील और एल्युमिनियम एक्सपोर्ट को झटका? यूरोप के कार्बन टैक्स से बढ़ी चिंता

तमाम द्विपक्षीय वार्ताओं, मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की चर्चाओं और बाजार पहुंच के प्रस्तावों के बाद भी भारत यूरोपीय संघ के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) को टालने या उसमें छूट हासिल करने में सफल नहीं हो सका है। यूरोपीय संघ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके कार्बन नियम वैश्विक स्तर पर सभी देशों पर समान रूप से लागू होंगे। इसके चलते जनवरी 2027 से पूरी तरह प्रभावी होने जा रहे इस तंत्र से भारतीय निर्यातकों को अब 55 से 80 यूरो प्रति टन तक का अतिरिक्त शुल्क चुकाना पड़ सकता है, जिससे यूरोपीय बाजार में भारतीय उत्पादों की मूल्य प्रतिस्पर्धा पर सीधा दबाव पड़ेगा।
क्या है कार्बन टैक्स और इसका बढ़ता दायरा?
कार्बन टैक्स मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर लगने वाला प्रत्यक्ष शुल्क है। शुरुआत में इस व्यवस्था के तहत स्टील, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, हाइड्रोजन और बिजली जैसे छह बुनियादी क्षेत्रों को शामिल किया गया था, लेकिन आगे चलकर इसका विस्तार इन कच्चे मालों से तैयार होने वाले लगभग 180 इंजीनियरिंग और विनिर्मित उत्पादों तक किया जा रहा है।
भारी उद्योगों और एमएसएमई पर वित्तीय दबाव
इस नए कर का सबसे बड़ा प्रभाव भारत के इस्पात और एल्युमीनियम उद्योग पर पड़ने का अनुमान है, जिनका यूरोपीय संघ को सालाना निर्यात लगभग 6 अरब डॉलर का है। टाटा स्टील, सेल, जेएसडब्ल्यू स्टील, जिंदल स्टील, वेदांता, हिंडाल्को और नाल्को जैसी प्रमुख कंपनियों के लाभ मार्जिन और निर्यात मात्रा पर इसका प्रतिकूल असर देखा जा सकता है। इसके अतिरिक्त ऑटो पार्ट्स, मशीनरी और फैब्रिकेटेड मेटल बनाने वाली मध्यम व लघु इकाइयां भी नए नियमों के दायरे में आने से प्रभावित होंगी।
कोयला आधारित ऊर्जा से हरित विकल्पों की ओर रुख जरूरी
भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती इसकी थर्मल पावर पर अत्यधिक निर्भरता है। सीबीएएम के तहत अप्रत्यक्ष बिजली खपत से जुड़े उत्सर्जन का भी कड़ा मूल्यांकन किया जाता है। वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए अब भारतीय उद्योगों के पास पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के स्थान पर अक्षय ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी स्वच्छ तकनीकों को तेजी से अपनाना ही मुख्य रास्ता बचा है।
