सांसों पर संकट! दिल्ली में ओजोन प्रदूषण ने बढ़ाई चिंता, नियंत्रण बना बड़ी चुनौती

नई दिल्ली। राजधानी में वायु प्रदूषण की बात होते ही आमतौर पर हमारा ध्यान धूल, धुएं और सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले सूक्ष्म कणों (पीएम 2.5) पर जाता है। लेकिन अब जमीनी स्तर पर बनने वाली ओजोन गैस दिल्ली के लिए एक नई और गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बन चुकी है। एक हालिया विश्लेषण के मुताबिक, मई महीने में दिल्ली के 45 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों में से 24 पर ओजोन का स्तर राष्ट्रीय मानकों से काफी ज्यादा पाया गया। हैरान करने वाली बात यह है कि इसका असर सिर्फ फैक्ट्रियों या गाड़ियों से भरी सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोग जहां रहते हैं, पढ़ते हैं या काम करते हैं, उन आवासीय और शैक्षणिक इलाकों में भी इसका भारी प्रभाव देखा गया है।
दिल्ली के प्रमुख ओजोन हॉटस्पॉट और उनके आंकड़े
इस विश्लेषण में दिल्ली के पांच इलाके ओजोन के सबसे बड़े हॉटस्पॉट बनकर उभरे हैं। इनमें सबसे खतरनाक स्थिति पूसा क्षेत्र की रही, जहां आठ घंटे का औसत ओजोन स्तर 292 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो कि तय राष्ट्रीय मानक (100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) से करीब तीन गुना ज्यादा है। इसके बाद दूसरे नंबर पर एनएसयूटी जाफरपुर में यह स्तर 229 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। कॉमनवेल्थ स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में 208, दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में 207 और ऐतिहासिक इलाके चांदनी चौक में ओजोन का स्तर 178 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर मापा गया।
बदलता मौसम और सालभर मंडराता ओजोन का खतरा
आंकड़े बताते हैं कि मई के महीने में पूसा इलाके में रिकॉर्ड 25 दिनों तक ओजोन का स्तर तय सीमा से ऊपर बना रहा। रिहायशी और शैक्षणिक क्षेत्रों में इसका लगातार बढ़ना यह साफ करता है कि यह प्रदूषण अब किसी एक कोने तक सीमित नहीं रह गया है। जानकारों के मुताबिक, हवा का रुख, बढ़ता तापमान और स्थानीय स्तर पर होने वाले रासायनिक बदलाव इसके लिए जिम्मेदार हैं। चिंता की बात यह भी है कि ओजोन अब सिर्फ गर्मियों की समस्या नहीं रह गई है। इस साल जनवरी में दो दिन, फरवरी में 16 दिन और मार्च में आठ दिन ऐसे थे जब वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में ओजोन ही सबसे मुख्य प्रदूषक था। पिछले सालों की तुलना में सर्दियों और शुरुआती महीनों में इसका ग्राफ तेजी से बढ़ा है, जिसके पीछे मौसम का बदलता मिजाज, तेज धूप और बढ़ता उत्सर्जन मुख्य वजहें हैं।
कैसे बनती है यह अदृश्य और घातक ओजोन गैस
जमीनी स्तर पर ओजोन गैस का निर्माण सीधे किसी गाड़ी के साइलेंसर या फैक्ट्री की चिमनी से नहीं होता। दरअसल, जब गाड़ियों और उद्योगों से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड (नॉक्स) और हवा में मौजूद वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (वीओसी) सूरज की तेज रोशनी के संपर्क में आते हैं, तो वातावरण में एक रासायनिक प्रतिक्रिया होती है। इसी केमिकल रिएक्शन की वजह से ग्राउंड-लेवल ओजोन बनती है। चूंकि यह सीधे तौर पर उत्सर्जित नहीं होती, इसलिए पारंपरिक प्रदूषकों के मुकाबले इस पर काबू पाना पर्यावरण विशेषज्ञों के लिए कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
