देश में अनाज का अंबार, गेहूं-चावल का भंडार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा

नई दिल्ली। घरेलू बाजार में गेहूं की कीमतों में लगातार तेजी देखी जा रही है। देश की राजधानी में अप्रैल महीने के दौरान जो गेहूं 2550 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर बिक रहा था, उसकी कीमत 16 जून को बढ़कर 2700 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। अनाज के दामों में आई इस उछाल के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण माने जा रहे हैं। पहला कारण विदेशों में होने वाले निर्यात में आई भारी तेजी है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 में देश से मात्र 6,448 टन गेहूं बाहर भेजा गया था, लेकिन अप्रैल 2026 में यह निर्यात लगभग सात गुना बढ़कर 45,162 टन के पार हो गया। विदेशों से आई इस मजबूत मांग ने स्थानीय मंडियों में कीमतों को ऊपर बनाए रखा है। इसके अतिरिक्त, दामों में बढ़त की दूसरी बड़ी वजह विभिन्न राज्यों से मंडियों में गेहूं की आवक कम होना और थोक खरीदारों की बढ़ती दिलचस्पी भी है।

सरकारी गोदामों में रिकॉर्ड खरीद और पांच साल का उच्चतम स्टॉक

गेहूं की महंगाई का दूसरा प्रमुख कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बड़े पैमाने पर की गई सरकारी खरीद है। फसल वर्ष 2025-26 के दौरान अनुकूल मानसूनी बारिश की बदौलत देश में 12.06 करोड़ टन गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार हुई। बंपर उत्पादन को देखते हुए सरकार ने इस सीजन में करीब 3.5 करोड़ टन गेहूं सीधे किसानों से खरीदा है, जिसके चलते एक जून तक केंद्रीय पूल में गेहूं का कुल भंडार 5.34 करोड़ टन के स्तर को छू गया। यह स्टॉक वर्ष 2021 के बाद पिछले पांच सालों में सबसे अधिक है। तुलनात्मक रूप से देखें तो दो महीनों के भीतर देश की बड़ी मंडियों में गेहूं करीब 6 फीसदी तक महंगा हुआ है। जहां दिल्ली में भाव 2700 रुपये है, वहीं कानपुर मंडी में यह 2515 रुपये और इंदौर में 2490 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया।

चावल का सर्वकालिक रिकॉर्ड भंडार और वैश्विक बाजार में धाक

दूसरी तरफ, देश में चावल के स्टॉक ने एक नया इतिहास रच दिया है। चालू फसल वर्ष में देश के भीतर 15.4 करोड़ टन चावल का बंपर उत्पादन हुआ, जिसके दम पर एक जून तक सरकारी अन्नागारों में धान और चावल का कुल संचय 6.84 करोड़ टन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर जा पहुंचा। विशेष बात यह है कि सरकार ने एक जुलाई तक आरक्षित भंडार (बफर स्टॉक) के लिए केवल 1.35 करोड़ टन का लक्ष्य निर्धारित किया था, यानी इस समय गोदामों में तय सीमा से पांच गुना से भी ज्यादा चावल मौजूद है। दुनिया के कुल चावल व्यापार में अकेले 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले भारत के लिए यह स्टॉक बेहद अहम है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले समय में अल नीनो के प्रभाव से मानसून कमजोर भी रहता है, तो भी भारत इस महा-स्टॉक के सहारे वैश्विक बाजार में बिना किसी रुकावट के आक्रामक तरीके से आपूर्ति जारी रख सकेगा।

तिलहन की तरफ बढ़ा किसानों का रुझान, सोयाबीन के रकबे में उछाल के आसार

मोटे अनाजों और पारंपरिक फसलों के अलावा इस बार तिलहन क्षेत्र से भी अच्छे संकेत मिल रहे हैं, जहां सोयाबीन की बुवाई के क्षेत्र में भारी बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। बाजार के जानकारों और उद्योग जगत के मुताबिक, सोयाबीन की कीमतों में आया चार साल का उच्चतम उछाल और कम बारिश की आशंकाओं ने किसानों की सोच बदल दी है। किसान अब गन्ना और मक्का जैसी अत्यधिक पानी की खपत वाली फसलों से दूरी बनाकर सोयाबीन की तरफ रुख कर रहे हैं। भारतीय कृषकों ने वर्ष 2025 में लगभग 1.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन बोया था, जिसमें इस साल 10 फीसदी तक की वृद्धि दर्ज की जा सकती है। पिछले महीने मंडियों में सोयाबीन के दाम 7,587 रुपये प्रति क्विंटल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए, जो सरकार द्वारा तय किए गए समर्थन मूल्य से कहीं ज्यादा हैं और यही मुनाफा किसानों को आकर्षित कर रहा है।

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