क्या ‘कॉकरोच’ हो सकता है चुनाव चिह्न? जानें चुनाव आयोग के नियम

नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर इन दिनों 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) को लेकर खूब चर्चा हो रही है, जिसने अब एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। जंतर-मंतर पर हुए एक हालिया प्रदर्शन के बाद लोग यह सवाल उठाने लगे हैं कि यदि आगे चलकर यह संगठन एक असली राजनीतिक पार्टी बनता है, तो क्या चुनाव आयोग इसे इसके नाम के मुताबिक 'कॉकरोच' (तिलचट्टा) चुनाव चिह्न दे सकता है? आइए जानते हैं कि इस पर देश के चुनावी नियम क्या कहते हैं।

फिलहाल राजनीतिक दल नहीं है CJP

आपको बता दें कि CJP अभी कोई रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टी नहीं है। यह खुद को युवाओं का एक 'प्रेशर ग्रुप' (दबाव समूह) कहती है। प्रेशर ग्रुप का काम चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों और फैसलों पर जनता की आवाज उठाना होता है। लेकिन सोशल मीडिया पर इसके बढ़ते प्रभाव को देखकर यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि भविष्य में इसे एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत कराया जा सकता है।

कैसे मिलता है नई पार्टी को चुनाव चिह्न?

भारत में किसी भी पार्टी को चुनाव चिह्न देने का काम भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission) करता है। इसके लिए “इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968” के कड़े नियम बने हुए हैं। देश की बड़ी और मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टियों के पास अपने फिक्स यानी आरक्षित चुनाव चिह्न होते हैं (जैसे बीजेपी का कमल या कांग्रेस का हाथ)। वहीं, नई या गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों को चुनाव आयोग द्वारा जारी की गई 'फ्री सिंबल्स' (मुक्त चुनाव चिह्न) की एक लिस्ट में से ही कोई एक सिंबल चुनना होता है।

क्या अपनी पसंद का सिंबल मिलना पक्का होता है?

नियमों के मुताबिक, कोई भी नई पार्टी अपनी मर्जी से कोई भी सिंबल नहीं ले सकती। पार्टियां चुनाव आयोग के सामने अपनी पसंद के कुछ विकल्प रख जरूर सकती हैं, लेकिन अंतिम फैसला पूरी तरह से चुनाव आयोग का ही होता है। आयोग जो सिंबल अलॉट करेगा, पार्टी को उसी के साथ चुनाव में जाना पड़ता है।

क्या CJP को मिल पाएगा 'कॉकरोच' का निशान?

चुनाव आयोग के मौजूदा रुख को देखते हुए 'कॉकरोच' चुनाव चिह्न मिलने की उम्मीद न के बराबर है। इसका मुख्य कारण यह है कि पिछले कुछ दशकों से चुनाव आयोग ने जीव-जंतुओं या जानवरों के नाम पर नए चुनाव चिह्न देना लगभग बंद कर दिया है। पुराने समय में आवंटित किए गए कुछ सिंबल (जैसे बसपा का हाथी) आज भी जारी हैं, लेकिन अब आयोग घरेलू सामान, फल-सब्जियों या निर्जीव चीजों को ही चुनाव चिह्न के रूप में प्राथमिकता देता है।

कैसे शुरू हुआ यह पूरा विवाद?

'कॉकरोच जनता पार्टी' की शुरुआत सोशल मीडिया पर एक व्यंग्य और विरोध प्रदर्शन के रूप में हुई थी। कुछ युवाओं ने इस अनोखे नाम के साथ एक ऑनलाइन मुहिम चलाई, जो देखते ही देखते वायरल हो गई। बाद में यह इंटरनेट से निकलकर सड़कों और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन तक पहुंच गई। हालांकि, अगर यह ग्रुप भविष्य में कभी चुनाव लड़ने का फैसला करता है, तो इसे 'कॉकरोच' की जगह चुनाव आयोग की लिस्ट में मौजूद किसी दूसरे आम चिह्न से ही संतोष करना पड़ेगा।

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