चीन ने ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट बूस्टर को वापस हासिल किया, भारत अभी कई साल दूर

नई दिल्ली। चीन ने ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट बूस्टर को वापस हासिल कर लिया है। इसके साथ ही वह उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जो दोबारा इस्तेमाल होने वाले लॉन्च सिस्टम पर काम कर रहे हैं। वहीं इसरों के दोबारा इस्तेमाल होने वाले नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल की डेमो-फ्लाइट में अभी कई साल और लगेंगे। चीन ने हैनान तट के पास वर्टिकल पावर्ड डिसेंट के बाद अपने लॉन्ग मार्च-10बी रॉकेट के पहले चरण के बूस्टर को वापस हासिल कर लिया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चाइना मैन्ड स्पेस एजेंसी के हवाले से बताया कि इस बूस्टर के इस साल के आखिर में दोबारा उड़ान भरने की उम्मीद है। इस कामयाबी से ग्लोबल लीडर्स के साथ अंतर कम तो हुआ है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक स्पेस-एक्स अभी भी इस मामले में बेंचमार्क बना हुआ है; इसने करीब एक दशक से फाल्कन-9 बूस्टर को लगातार रिकवर करके दोबारा इस्तेमाल किया है, जिससे लॉन्चिंग की लागत और तौर-तरीके पूरी तरह बदल गए हैं। ब्लू ओरिजिन भी अपने भारी-भरकम न्यू ग्लेन रॉकेट के लिए दोबारा इस्तेमाल होने वाले पहले चरण पर काम कर रहा है। चीन की यह कामयाबी दिखाती है कि दोबारा इस्तेमाल होने वाले ऑर्बिटल लॉन्च सिस्टम अब सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कमर्शियल और लूनर प्रोग्राम चलाने वाली बड़ी स्पेस ताकतों के लिए यह एक जरूरी क्षमता बनती जा रही है।
स्पेस एजेंसी की ताजा जानकारी के विश्लेषण से पता चलता है कि एनजीएलवी का विकास शुरू हो गया है। एनजीएलवी को आंशिक रूप से दोबारा इस्तेमाल होने वाला, इंसानों को ले जाने में सक्षम और व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक लॉन्चर बताया गया है। इस तीन-स्टेज वाले व्हीकल को लो-अर्थ ऑर्बिट तक 30 टन तक का पेलोड ले जाने के लिए डिज़ाइन किया जा रहा है और इसके दो वेरिएंट की योजना है। इसरो ने बताया कि पहले स्टेज को वर्टिकल लैंडिंग और दोबारा इस्तेमाल के जरिए रिकवरी के लिए कॉन्फ़िगर किया जाएगा। यह रिकवरी का तरीका मोटे तौर पर फाल्कन-9 जैसा ही है, जिसे सबसे पहले अपनाया गया था और अब चीन भी इसी रास्ते पर चल रहा है।

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