दिल्ली हाईकोर्ट ने जताई चिंता, जिमखाना क्लब केस में पूछा- आखिर नियमों का पालन क्यों नहीं?

नई दिल्ली। देश की राजधानी की बेशकीमती जमीनों के व्यावसायिक या अन्य इस्तेमाल को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के रुख पर बेहद तल्ख टिप्पणी की है। दिल्ली जिमखाना क्लब, इंडियन पोलो क्लब और दिल्ली रेस क्लब की जमीनों से जुड़ी सरकारी योजना पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने गंभीर चिंता व्यक्त की। माननीय न्यायाधीश ने दो टूक शब्दों में कहा कि प्रदूषण की मार से पहले ही बेहाल दिल्ली की सांसें इन फैसलों से और भी छोटी हो जाएंगी, क्योंकि लुटियंस और नई दिल्ली नगर पालिका (NDMC) क्षेत्र के बचे-खुचे ग्रीन जोन को भी कंक्रीट के जंगल में बदलने की तैयारी की जा रही है। उन्होंने चेताया कि यदि थोड़ी-बहुत हरियाली और खुली जगह भी छीन ली गई, तो यहां सबका दम घुट जाएगा।

हेरिटेज क्लबों की जमीनों को अचानक खाली कराने पर कोर्ट ने उठाए सवाल

जस्टिस कृष्णा ने इंडियन पोलो एसोसिएशन की तरफ से दायर याचिका पर तीखी बहस के दौरान सरकार से कई तीखे सवाल पूछे। अदालत ने पूछा कि आखिर अचानक पोलो क्लब की जमीन की क्या जरूरत आ पड़ी है और जिमखाना जैसे ऐतिहासिक व हेरिटेज महत्व रखने वाले ढांचों का सरकार क्या करेगी? क्या इन जमीनों पर 20 मंजिला ऊंची इमारतें खड़ी की जाएंगी और सरकार दिल्ली को किस स्वरूप में देखना चाहती है? कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा कि जब पिछले 200 सालों में इस जमीन की आवश्यकता नहीं पड़ी, तो अब अचानक ऐसा क्या बदल गया है? गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 20 मई को जयपुर पोलो ग्राउंड (रेस कोर्स) को खाली करने का अल्टीमेटम दिया था, जिसके खिलाफ एसोसिएशन ने पहले निचली अदालत और फिर स्टे न मिलने पर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

पटियाला हाउस कोर्ट को 10 जून तक स्टे अर्जी पर फैसला करने का आदेश

मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च न्यायालय ने याचिका का निपटारा कर दिया और संबंधित निचली अदालत (पटियाला हाउस कोर्ट) को कड़े निर्देश जारी किए। हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल कोर्ट आगामी 10 जून तक हर हाल में जमीन खाली करने के नोटिस पर लगाई गई स्टे एप्लीकेशन (स्थगन याचिका) पर अपना अंतिम फैसला सुनाए। मालूम हो कि केंद्र सरकार द्वारा पोलो क्लब प्रबंधन को आगामी 20 जून तक पूरा परिसर खाली करने का अंतिम नोटिस थमाया गया है, जिस पर अब बुधवार तक निचली अदालत का रुख साफ होना है।

बहुमंजिला इमारतों के जनहित वाले तर्क को उच्च न्यायालय ने किया खारिज

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के स्थायी वकील आशीष दीक्षित ने दलील पेश की थी कि यह बेशकीमती जमीन पूरी तरह से सार्वजनिक कल्याण और रक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए बेहद आवश्यक है। हालांकि, न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने सरकार के इस जनहित वाले तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने पलटकर सवाल किया कि खुली जगहों को खत्म कर हाइराइज (गगनचुंबी) इमारतें बनाना किस तरह से जनहित के दायरे में आता है? जज ने बेहद भावुक और सख्त लहजे में कहा कि बहुमंजिला इमारतों से पटी इस दिल्ली में अब आम इंसान का सांस लेना भी दूभर हो जाएगा, और यदि महानगर में रहने का यही तरीका है तो भगवान ही सबको बचाए।

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