एआई रेस में भारत का जलवा: 71 देशों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मिला चौथा स्थान, जर्मनी जैसे दिग्गजों को पछाड़ा

नई दिल्ली | 'स्टेट ऑफ इंडिया डिजिटल इकोनॉमी' (SIDE) 2026 की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत वैश्विक पटल पर एक बड़ी ताकत बनकर उभरा है और वह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी डिजिटल अर्थव्यवस्था बन गया है। इस रिपोर्ट के 'सीएचआईपीएस-एआई इंडेक्स' (CHIPS-AI Index) में 71 देशों की कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच भारत ने चौथा स्थान हासिल किया है। डिजिटल प्रदर्शन और दक्षता के मामले में भारत ने जर्मनी, फ्रांस, जापान और कनाडा जैसे शक्तिशाली व विकसित देशों को काफी पीछे छोड़ दिया है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी धाक जमाते हुए भारत ने डिजिटल रूप से प्रदान की जाने वाली सेवाओं के वैश्विक व्यापार से $328 Billion $ (लगभग 328 अरब अमेरिकी डॉलर) की रिकॉर्ड कमाई की है। इसके साथ ही, भारत अब दुनिया के दूसरे सबसे बड़े एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) टैलेंट पूल का मुख्य केंद्र बन चुका है।


विकासशील देशों के पास एआई का 72% यूजर बेस, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का बढ़ा दबदबा

वैश्विक डिजिटल परिदृश्य में एक अभूतपूर्व और बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करने वाले कुल लोगों में से 72 प्रतिशत आबादी अब विकासशील देशों में निवास करती है। इसमें भी भारत और चीन की हिस्सेदारी इतनी विशाल है कि ये दोनों पड़ोसी देश मिलकर पूरी दुनिया के कुल एआई उपयोग का लगभग दो-पांचवां ($40%$) हिस्सा अपने पास रखते हैं। रिजनरेटिव एआई (Generative AI) मानव इतिहास की किसी भी अन्य तकनीक की तुलना में सबसे तीव्र गति से पैर पसारने वाली विधा बन चुकी है, जिसने लॉन्च होते ही विकासशील देशों के बाजारों और युवाओं को अपनी ओर आकर्षित किया है। इस डिजिटल क्रांति ने वैश्विक नेतृत्व का नक्शा बदल दिया है; वर्तमान में दुनिया की शीर्ष पांच डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में से तीन देश—चीन, सिंगापुर और भारत—इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) क्षेत्र से हैं। यह बदलाव पारंपरिक उत्तरी अटलांटिक देशों के वर्चस्व को चुनौती देते हुए एक नई 'त्रिध्रुवीय डिजिटल व्यवस्था' के उदय का साफ संकेत है।

नीतिगत दूरदर्शिता और अनुसंधान से नवाचार को उत्पादकता में बदलने की आवश्यकता

भारतीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (ICRIER) के विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत ने मजबूत कनेक्टिविटी, युवा उद्यमिता और अपने विश्वस्तरीय डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के दम पर एक बेहद ठोस आधारशिला तैयार कर ली है। देश अब महज एक डिजिटल उपभोक्ता या तकनीक अपनाने वाला देश नहीं रहा, बल्कि एक डिजिटल अगुआ (लीडर) की भूमिका में है। हालांकि, इस तरक्की को निरंतर बनाए रखने और इसे देश की वास्तविक उत्पादकता में तब्दील करने के लिए मजबूत संस्थानों, अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र (रिसर्च इकोसिस्टम) में भारी निवेश और दूरदर्शी नीतिगत दूरदर्शिता की दरकार होगी। भारत कम-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था होने के बावजूद सॉफ्टवेयर, आईटी सेवाओं और क्लाउड-आधारित समाधानों का एक प्रमुख वैश्विक निर्यातक बन गया है, जो ब्रिक्स (BRICS) देशों के कुल डिजिटल सेवा व्यापार में अकेले लगभग 50 प्रतिशत का योगदान देता है।

प्रतिभा और निवेश में बड़ा असंतुलन, साइबर अपराध और डिजिटल धोखाधड़ी बने नए खतरे

इस शानदार प्रगति के बीच रिपोर्ट कुछ गंभीर चुनौतियों और विसंगतियों की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है। भारत के पास वैश्विक एआई उपयोगकर्ताओं का लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा होने और अमेरिका के बाद दूसरी सबसे बड़ी एआई प्रतिभा होने के बावजूद, वैश्विक स्तर पर होने वाले निजी एआई निवेश में भारत की हिस्सेदारी महज 1 प्रतिशत है। यह एक बड़ा अंतर है जिसे पाटने के लिए घरेलू स्तर पर जोखिम पूंजी (वेंचर कैपिटल) जुटाने और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की आवश्यकता है। वर्तमान में उन्नत एआई चिप्स, सुपरकंप्यूटिंग क्षमता और बड़े भाषा मॉडल (LLMs) जैसी अत्याधुनिक तकनीकें कुछ चुनिंदा विकसित देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक ही सीमित हैं। इसके अलावा, तेज डिजिटलीकरण के कारण देश में ऑनलाइन वित्तीय अपराध और डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, जो अब भारत में सबसे ज्यादा दर्ज किए जाने वाले अपराध बन चुके हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस डिजिटल विकास की छिपी हुई लागतों, साइबर सुरक्षा खतरों और डिजिटल अलगाव (बहिष्करण) से निपटने के लिए सुरक्षा प्रणालियों में पर्याप्त निवेश और सख्त सुरक्षा नीतियां लागू करना अनिवार्य होगा।

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