छोटे जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी छलांग, हाई रिस्क मातृ मामलों का सफल प्रबंधन

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की चिकित्सा और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को जमीनी स्तर पर सुदृढ़ करने की दिशा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार की दूरदर्शी मुहिम अब धरातल पर बड़े और ऐतिहासिक परिणाम दिखाने लगी है। ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं को स्थानीय स्तर पर ही महानगरों जैसी उच्च स्तरीय और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई 'रीजनल रिसोर्स एंड ट्रेनिंग सेंटर' (RRTC) योजना डॉक्टरों के लिए वरदान साबित हो रही है। इस योजना के अंतर्गत प्रदेश के सरकारी डॉक्टरों को दिए जा रहे व्यावहारिक और 'हैंड-ऑन प्रशिक्षण' (प्रैक्टिकल ट्रेनिंग) ने उनके भीतर के आत्मविश्वास को एक नए शिखर पर पहुंचा दिया है।
पहले जिन जटिल और जोखिम भरे मामलों को देखकर डॉक्टर घबरा जाते थे, अब प्रदेश के सुदूर और छोटे जिलों के सरकारी चिकित्सक गंभीर एनीमिया (खून की अत्यधिक कमी) और अनियंत्रित उच्च रक्तचाप (हाई बीपी) जैसे बेहद पेचीदा और हाई रिस्क प्रसव के मामलों को बड़े मेडिकल कॉलेजों या लखनऊ के लिए रेफर करने के बजाय स्थानीय जिला अस्पतालों में ही पूरी तरह सुरक्षित और सफल तरीके से खुद संभाल रहे हैं। इससे न केवल गरीब मरीजों का पैसा बच रहा है, बल्कि समय पर इलाज मिलने से जच्चा-बच्चा की जान भी सुरक्षित हो रही है।
20 प्रमुख चिकित्सा संस्थानों को बनाया गया प्रशिक्षण का केंद्र; सचिव डॉ. पिंकी जोवल ने साझा की सफलता की रूपरेखा
इस क्रांतिकारी स्वास्थ्य मॉडल की तकनीकी और प्रशासनिक बारीकियों को साझा करते हुए चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की सचिव डॉ. पिंकी जोवल ने एक विशेष प्रेस वार्ता में बताया कि पूर्व के वर्षों में जिला स्तर पर डिग्रियां और योग्यता होने के बावजूद डॉक्टरों के भीतर कुछ गंभीर आपातकालीन स्थितियों (जैसे शॉक लगना, प्रसव पूर्व अत्यधिक रक्तस्राव या एंटी पार्टम हैमरेज, और प्रसव में होने वाली लंबी व असहनीय पीड़ा) को अकेले संभालने के व्यावहारिक आत्मविश्वास की भारी कमी थी। इसी झिझक के कारण डॉक्टर किसी भी जोखिम से बचने के लिए मरीजों को तत्काल हायर सेंटर रेफर कर देते थे, जिससे रास्ते में ही कई महिलाओं की मौत हो जाती थी।
इस गंभीर समस्या को जड़ से समाप्त करने के लिए मुख्यमंत्री के सीधे दिशा-निर्देश पर वर्ष 2017 में आरआरटीसी (RRTC) कार्यक्रम का खाका तैयार किया गया था:
प्रथम चरण की रणनीति: योजना के पहले चरण के तहत राज्य के 20 शीर्ष और अत्याधुनिक मेडिकल कॉलेजों को आरआरटीसी सेंटर के रूप में तब्दील किया गया। इन सेंटरों के माध्यम से उनके आसपास से जुड़े जिलों के डॉक्टरों की कार्यक्षमता और कौशल को बढ़ाने का काम किया गया।
द्वितीय चरण का हाइब्रिड मॉडल: वर्तमान में चल रहे दूसरे चरण के तहत डॉक्टरों को केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि हाइब्रिड और पूरी तरह से व्यावहारिक माध्यमों से सीधे वरिष्ठ विशेषज्ञों की देखरेख में लाइव प्रसव और ऑपरेशनों की ट्रेनिंग दी जा रही है।
सीतापुर: जिला महिला अस्पताल बना सफलता का सबसे बड़ा रोल मॉडल; 3 महीने में कराए 2218 हाई रिस्क प्रसव
इस विशेष व्यावहारिक प्रशिक्षण का सबसे अचंभित करने वाला और सुखद परिणाम सीतापुर जिला महिला अस्पताल में देखने को मिला है, जिसने स्वास्थ्य क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है:
5 डॉक्टरों का अद्भुत कारनामा: सीतापुर जिला अस्पताल में इस योजना के तहत ट्रेनिंग पाकर लौटे महज 5 डॉक्टरों की टीम ने पिछले 90 दिनों (तीन महीनों) के भीतर कुल 2218 अत्यंत गंभीर और उच्च जोखिम वाले प्रसवों को बिना किसी बड़े मेडिकल कॉलेज में रेफर किए शत-प्रतिशत सफलतापूर्वक संपन्न कराया।
असंभव को किया संभव: इन डॉक्टरों ने ऐसे मामलों को भी संभाला जहां गर्भवती महिला के शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर गिरकर महज 2 मिलीग्राम (जो कि चिकित्सकीय रूप से बेहद खतरनाक और जानलेवा माना जाता है) तक पहुंच गया था, या जिनका ब्लड प्रेशर (रक्तचाप) 200 के पार जा चुका था।
सीजेरियन प्रसव में भारी उछाल: डॉक्टरों के इस बढ़ते हौसले का ही नतीजा है कि आज से 5 साल पहले तक जहाँ इस सरकारी अस्पताल में पूरे दिन में केवल 2 से 3 सिजेरियन (ऑपरेशन वाले) प्रसव होते थे, वहीं अब यहाँ औसतन 10 से 12 सफल प्रसव प्रतिदिन हो रहे हैं। इस अभूतपूर्व बदलाव और भरोसे के चलते अब केवल स्थानीय ही नहीं, बल्कि पड़ोसी जिलों जैसे लखीमपुर, शाहजहांपुर, बरेली, बहराइच, गोंडा और हरदोई से भी बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाएं इलाज और सुरक्षित प्रसव के लिए खिंची चली आ रही हैं।
लखनऊ: वीरांगना अवंती बाई महिला चिकित्सालय में मातृ मृत्यु दर में 90 प्रतिशत तक की ऐतिहासिक कमी
इस जीवन रक्षक प्रशिक्षण का सीधा और सबसे बड़ा गुणात्मक प्रभाव राजधानी लखनऊ के वीरांगना अवंती बाई महिला अस्पताल (डफरिन) में भी साफ तौर पर देखा जा सकता है। यहाँ के 10 डॉक्टरों के विशेष रूप से प्रशिक्षित होने के बाद अस्पताल के प्रसव कक्ष में होने वाली मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality Rate) में 80 से 90 प्रतिशत तक की रिकॉर्ड और ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है।
अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारियों के अनुसार, पहले जहां प्रसव के दौरान किसी भी गंभीर या क्रिटिकल स्थिति के पैदा होते ही डॉक्टरों को वरिष्ठ डॉक्टरों का इंतजार करना पड़ता था या किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) से डॉक्टरों की टीम बुलानी पड़ती थी, वहीं अब इस ट्रेनिंग की बदौलत ऑन-ड्यूटी डॉक्टर आपातकाल के समय महज दो से तीन मिनट के भीतर त्वरित, सटीक और जीवन रक्षक सर्जिकल निर्णय लेने में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुके हैं।
केजीएमयू और एएमयू संभाल रहे हैं मेंटरशिप की कमान; पूरे उत्तर प्रदेश में लागू होगा यह मॉडल
आरआरटीसी की नोडल अधिकारी डॉ. सीमा टंडन ने इस योजना के विस्तार की जानकारी देते हुए बताया कि वर्तमान में देश के दो सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है:
केजीएमयू (KGMU) विंग: किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ मेंटर्स के तहत इस समय सीतापुर, बहराइच, बलरामपुर, गोंडा और श्रावस्ती जिला अस्पतालों के डॉक्टरों की ट्रेनिंग पूरी हो चुकी है।
एएमयू (AMU) विंग: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चिकित्सा विभाग के तहत हाथरस, कासगंज और खुद अलीगढ़ जिला अस्पताल के डॉक्टरों को पूरी तरह से निपुण बनाया जा चुका है।
क्वीन मैरी अस्पताल की विभागाध्यक्ष और आरआरटीसी की मुख्य मेंटर डॉ. अंजू अग्रवाल ने इस पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि इस दूरगामी कदम से 'फर्स्ट रेफरल यूनिट्स' (FRU) से आने वाले गैर-जरूरी और अनावश्यक रेफरल के मामलों में भारी कमी आई है, जिससे बड़े मेडिकल कॉलेजों पर से मरीजों का अत्यधिक दबाव कम हुआ है। इस शानदार जमीनी सफलता को देखते हुए उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग ने अब राज्य के सभी 18 मंडलों और सभी 75 जिलों के सरकारी डॉक्टरों को चरणबद्ध तरीके से इस जीवन रक्षक प्रशिक्षण से जोड़ने का एक व्यापक और विस्तृत रोडमैप (भविष्य की योजना) तैयार कर लिया है, ताकि पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य प्रणाली को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाया जा सके।
