ममता को उपाध्यक्ष, अभिषेक को राष्ट्रीय महासचिव! सियासी गलियारों में नई अटकलें

नई दिल्ली/कोलकाता। दिल्ली में सोनिया-ममता और राहुल-अभिषेक की बैक-टू-बैक मुलाकातों के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कांग्रेस में विलय (Merger) की अटकलें बेहद तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि यह विलय हकीकत बनता है, तो ममता बनर्जी को कांग्रेस का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव जैसी बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। हालांकि, दोनों ही पार्टियों के शीर्ष नेताओं और प्रवक्ताओं ने इस विलय की खबरों को पूरी तरह 'अफवाह और बेबुनियाद' करार दिया है।
विलय की खबरों के बीच टीएमसी में बड़ी बगावत
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से जूझ रही है। पार्टी के भीतर विधायकों और सांसदों के दो धड़े साफ दिखाई दे रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि बागी विधायकों की संख्या बढ़कर 64 तक पहुंच चुकी है, जबकि करीब 19-20 लोकसभा सांसद एक अलग गुट बनाने की फिराक में हैं। इस बागी गुट ने लोकसभा अध्यक्ष से संसद में अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग की है और वे जल्द ही असली टीएमसी होने का दावा ठोकने के लिए चुनाव आयोग का रुख कर सकते हैं। इन बागियों ने साफ किया है कि वे किसी भी कीमत पर कांग्रेस में शामिल नहीं होंगे।
नेताओं की मुलाकातों के पीछे का असली सच
भले ही राजनीतिक हलकों में विलय को लेकर कयास लगाए जा रहे हों, लेकिन कांग्रेस और टीएमसी दोनों के सूत्रों ने साफ किया है कि ऐसी कोई औपचारिक बातचीत नहीं हुई है। नेताओं के बीच असल चर्चा 'इंडिया गठबंधन' (INDIA Alliance) को मजबूत करने, आगामी राष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्षी एकजुटता और पश्चिम बंगाल के मौजूदा राजनीतिक हालातों पर हुई है। यह भी साफ हुआ है कि अगस्त में हैदराबाद में होने वाली विपक्षी गठबंधन की अगली बैठक और भविष्य की रणनीति को लेकर दोनों दलों में सहमति बनी है, और टीएमसी ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है।
पार्टी के अंदरूनी रुख में मतभेद
कांग्रेस के भीतर इस संभावित विलय को लेकर दो तरह की राय देखने को मिल रही है। दिल्ली के कुछ वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अगर टीएमसी का विलय होता है, तो इससे पार्टी मजबूत होगी और टीएमसी के भीतर जारी सांसदों-विधायकों की बगावत पर भी लगाम लग सकेगी। हालांकि, उनकी शर्त है कि इसका प्रस्ताव खुद ममता बनर्जी की तरफ से आना चाहिए। दूसरी तरफ, पश्चिम बंगाल के स्थानीय कांग्रेस नेता और जमीनी कार्यकर्ता इस विलय की संभावनाओं का पुरजोर विरोध कर रहे हैं, क्योंकि राज्य में दोनों दल लंबे समय से एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे हैं।
ममता बनर्जी ने क्यों छोड़ी थी कांग्रेस? (इतिहास)
ममता बनर्जी और कांग्रेस का रिश्ता दशकों पुराना है। 1990 के दशक में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की कमान पूरी तरह अपने हाथों में चाहती थीं ताकि वह वामपंथियों (Left Front) के खिलाफ एक आक्रामक लड़ाई लड़ सकें। लेकिन उस समय के कांग्रेस आलाकमान (विशेषकर पी.वी. नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी के कार्यकाल में) के साथ उनके गहरे मतभेद हो गए। ममता का आरोप था कि बंगाल कांग्रेस के कई बड़े नेता अंदरखाने वामपंथियों के साथ मिले हुए हैं और आलाकमान उनकी जमीनी ताकत को तवज्जो नहीं दे रहा है। इसी नाराजगी के चलते उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया और 1997 में 'तृणमूल कांग्रेस' (TMC) के रूप में अपनी नई पार्टी की स्थापना की थी।
