मणिपुर में फुटबॉल संस्कृति का अनोखा रंग, डूरंड कप को मिलता है घरेलू माहौल

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की राजधानी इम्फाल स्थित खुमान लंपक मुख्य स्टेडियम की फ्लडलाइटें भले ही अभी रोशन न हुई हों, लेकिन शहर के कोने-कोने में सुबह का सूरज निकलने के साथ ही दिनभर का खेल शुरू हो जाता है। मोहल्लों के छोटे-छोटे मैदानों, स्कूली परिसरों और रिहायशी बस्तियों के बीच खाली बची जमीनों पर सुबह-सवेरे फुटबॉल मैच शुरू हो जाते हैं। बच्चे लंबे समय तक इस्तेमाल के कारण अपनी पुरानी गोलाकार आकृति खो चुकी गेंद के पीछे उत्साह से दौड़ते नजर आते हैं। किशोर विद्यालय की घंटी बजने से पहले खेल के मैदान पर कुछ कीमती पल चुरा लेते हैं। गलियों और मोहल्लों की पुरानी खेल प्रतिद्वंद्विता एक बार फिर मैदान पर जीवंत हो उठती है, जहाँ दर्शकों की भूमिका में माताएँ, स्थानीय दुकानदार और राह चलते लोग होते हैं। भारतीय खेल जगत में अब ऐसे गिने-चुने स्थान ही शेष बचे हैं, जहाँ फुटबॉल इस प्रकार रोजमर्रा की आम जिंदगी में पूरी तरह घुला हुआ हो। यहाँ फुटबॉल केवल देखा नहीं जाता, बल्कि एक जीवंत भाषा की तरह बोला जाता है, और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह खेल विरासत स्वतः पहुँचती रहती है।

मणिपुर में फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं, जीवनशैली है

स्थानीय मोहल्लों के मैदानों से लेकर शैक्षणिक परिसरों तक, फुटबॉल मणिपुर के सामाजिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। स्थानीय मुकाबलों के दौरान स्टेडियमों में उमड़ने वाली भारी भीड़ और खिलाड़ियों के प्रति आम जनता का गहरा जुनून इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है। यहाँ किसी भी साधारण बच्चे के लिए राष्ट्रीय टीम तक का सफर तय करना कोई दूर का असंभव सपना नहीं प्रतीत होता। उसे साफ महसूस होता है कि जिस पथ पर उसके स्थानीय आदर्श खिलाड़ी चलकर आगे बढ़े हैं, वही मार्ग उसके सामने भी पूरी तरह खुला हुआ है। यही अनूठी खेल संस्कृति मणिपुर को भारत की सबसे बड़ी खेल प्रतिभा-भूमियों में शुमार करती है। ओइनम बेमबेम देवी ने भारतीय महिला फुटबॉल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई ऊँचाइयों से नवाजा है। फीफा अंडर-17 विश्व कप के दौरान जीकसन सिंह का ऐतिहासिक हेडर अब मणिपुर की सुनहरी खेल स्मृतियों का स्थायी हिस्सा बन चुका है, और नोरेम महेश सिंह इस लंबी और गौरवशाली सूची का नया नाम हैं।

नेरोका एफसी (NEROCA FC) और ट्राउ एफसी (TRAU FC) जैसे प्रतिष्ठित क्लबों ने भी यह साबित कर दिखाया है कि मणिपुर की फुटबॉल पहचान केवल कुछेक व्यक्तिगत प्रतिभाओं पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक मजबूत, सुव्यवस्थित फुटबॉल संस्कृति और पूरा तंत्र कार्य कर रहा है। ऐसे खेल-प्रेमी राज्य में एक सदी से भी अधिक समय से भारतीय फुटबॉल इतिहास का अहम हिस्सा रहे प्रतिष्ठित 'डूरंड कप' का पहुँचना एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। एशिया की सबसे पुरानी और भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा आयोजित यह फुटबॉल प्रतियोगिता 1888 से लेकर आज तक समय के साथ निरंतर बदलती रही है, परंतु इसने अपनी मूल जड़ों को कभी नहीं छोड़ा। 'सर्विसेज' की टीमें आज भी देश के बड़े कॉर्पोरेट क्लबों और उभरती युवा प्रतिभाओं के साथ मैदान पर तालमेल बिठाती हैं। कई पीढ़ियों के दिग्गजों ने इस प्रतिष्ठित मंच का उपयोग अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने के लिए किया है। यही कारण है कि जब वर्ष 2022 में डूरंड कप पहली बार इम्फाल की धरती पर पहुँचा, तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि कोई नया शहर इस टूर्नामेंट से अनजान है, बल्कि ऐसा अनुभव हुआ मानो डूरंड कप अपने वास्तविक घर लौट आया हो।

वर्ष 2022 में डूरंड कप की ऐतिहासिक 'घर वापसी'

डूरंड कप पहली बार वर्ष 2022 में इम्फाल पहुँचा था। ट्राउ एफसी और नेरोका एफसी के बीच खेले गए रोमांचक 'इम्फाल डर्बी' मुकाबले के साथ ही इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता और इस शहर का अटूट रिश्ता कायम हुआ। मैच से ठीक पहले आधे दिन के सार्वजनिक अवकाश की घोषणा और स्टेडियम में उमड़ा जनसैलाब इस बात की गवाही दे रहा था कि डूरंड कप को यहाँ महज एक अन्य फुटबॉल टूर्नामेंट की तरह नहीं देखा जाता। खुमान लंपक स्टेडियम देखते ही देखते इस ऐतिहासिक राष्ट्रीय टूर्नामेंट के सबसे प्रमुख और जीवंत केंद्रों में शुमार हो गया। मुकाबले शुरू होने से काफी पहले ही दर्शक बड़ी संख्या में खुमान लंपक की ओर बढ़ने लगते थे। जैसे ही दोनों प्रतिस्पर्धी टीमें मैदान पर उतरती थीं, पूरा स्टेडियम दर्शकों के हुजूम, रंगों और गगनभेदी शोर से सराबोर हो जाता था। मैदान पर होने वाले हर शानदार टैकल पर गूँजती तालियाँ, हर आक्रमण के साथ आगे झुकती दर्शकों की भीड़ और पूरे स्टेडियम में लहराती मानव-श्रृंखला ने यह स्पष्ट कर दिया कि इम्फाल में फुटबॉल केवल एक खेल नहीं, बल्कि एक सामूहिक जन-भावना है। इसके बाद से प्रत्येक संस्करण में खुमान लंपक का यही भव्य और ऊर्जावान दृश्य लगभग दोहराया जाता रहा है। यहाँ आने वाले दर्शक केवल निष्क्रिय रूप से खेल नहीं देखते, बल्कि खेल की हर बारीकी को गहराई से समझते हैं।

इस बार इम्फाल में चार मजबूत टीमें और फुटबॉल का सिर चढ़कर बोलता जुनून

इस वर्ष डूरंड कप के ग्रुप डी में ट्राउ एफसी, नेरोका एफसी, एफसी रेंगदाई और इंडियन नेवी एफटी जैसी बेहतरीन टीमें शामिल हैं। इम्फाल का स्थानीय चरण 28 जुलाई से आरंभ हुआ है, जिसकी शुरुआत पारंपरिक रूप से ट्राउ एफसी और नेरोका एफसी के बीच होने वाले बहुप्रतीक्षित 'इम्फाल डर्बी' मुकाबले से हुई, जबकि इस चरण का समापन 12 अगस्त को नेरोका एफसी और एफसी रेंगदाई के बीच होने वाले मैच के साथ होगा। ग्रुप डी के ये सभी मुकाबले केवल रणनीतिक बढ़त या अंक तालिका में ऊपर पहुँचने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनके साथ भूगोल और पुरानी ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विताएँ भी जुड़ी हुई हैं। मैदान पर हासिल की जाने वाली प्रत्येक जीत का महत्व केवल तीन अंकों से कहीं अधिक होता है, और हर हार का मनोवैज्ञानिक असर खेल मैदान की सीमाओं से बाहर तक महसूस किया जाता है। वर्ष 2022 की पहली आधिकारिक डर्बी में नेरोका ने 3-1 से शानदार जीत हासिल की थी, और उसके बाद से दोनों टीमों के बीच खेले गए सभी मुकाबले बेहद रोमांचक रहे हैं। पिछले संस्करण में मैच के दौरान 10 खिलाड़ियों के साथ खेलने के बावजूद ट्राउ ने लगभग अंतिम क्षणों तक नेरोका को पूरी तरह रोके रखा था, परंतु इंजरी टाइम में अरुणकुमार सिंह द्वारा दागे गए गोल ने मुकाबले को बराबरी पर ला दिया था।

क्यों खास है इम्फाल डर्बी? इन दोनों स्थानीय टीमों का आमने-सामने होना अब इम्फाल की अनूठी फुटबॉल पहचान का मुख्य हिस्सा बन चुका है। खुमान लंपक एक बार फिर फुटबॉल के खुमार और रंगों में पूरी तरह रंगने के लिए तैयार रहता है। यहाँ खेला जाने वाला प्रत्येक मुकाबला केवल 90 मिनट की शारीरिक गतिविधि नहीं होता, बल्कि यह शहर की पुरानी खेल प्रतिष्ठा और गौरव का सवाल बन जाता है। मणिपुर के लिए दांव पर केवल अंक तालिका के अंक नहीं होते, बल्कि यह हर मुकाबला उस स्थानीय फुटबॉल संस्कृति का एक भव्य उत्सव है जो स्कूलों, छोटे क्लबों और मोहल्लों के मैदानों में साँस लेती है। स्टैंड्स में बैठकर मैच देख रहे नन्हें बच्चों के लिए यह देखना एक प्रेरणादायी अनुभव होता है कि आज जिन दिग्गज खिलाड़ियों को वे अपने सामने मैदान पर खेलता देख रहे हैं, वे कभी बिल्कुल उन्हीं की तरह किसी साधारण से मैदान पर नंगे पाँव गेंद के पीछे दौड़ा करते थे। शायद डूरंड कप का सबसे बड़ा और स्थायी योगदान भी यही है—वह ट्रॉफी के दायरे से बहुत आगे बढ़कर युवा और उभरती प्रतिभाओं के लिए सुनहरे दरवाजे खोलता है और उस स्वदेशी फुटबॉल संस्कृति को एक बड़ा राष्ट्रीय मंच प्रदान करता है, जिसे अपनी प्रामाणिकता साबित करने के लिए किसी बाहरी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती। डूरंड कप भले ही कुछ हफ्तों के लिए इम्फाल में मेहमान बनकर रहता है, परंतु फुटबॉल इस शहर में हमेशा जीवित रहता है—स्कूलों की कक्षाओं के बाद, स्थानीय क्लबों में और उन छोटे-छोटे मैदानों में, जहाँ हर सुबह कोई न कोई बच्चा उम्मीद भरी नजरों से गेंद के पीछे भागता दिखाई देता है। इसलिए, जब-जब खुमान लंपक का स्टेडियम खेल प्रेमियों से खचाखच भरता है, तब-तब यह इस बात की याद दिलाता है कि डूरंड कप को इम्फाल में कोई नया घर नहीं मिला है, बल्कि यह टूर्नामेंट केवल उसी पावन भूमि पर वापस लौटा है जहाँ से फुटबॉल कभी दूर गया ही नहीं था।

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