बढ़ते सियासी तनाव पर मायावती की प्रतिक्रिया, केंद्र को बताया क्या करना चाहिए

लखनऊ। संसद के मानसून सत्र और सीजेपी के प्रस्तावित मार्च के बीच बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने देश के ज्वलंत मुद्दों पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने पेपर लीक, गिरती शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के भविष्य को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। मायावती का कहना है कि संसद से लेकर सड़कों और जंतर-मंतर तक जो टकराव की स्थिति बनी है, उसे देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए परिपक्व सूझबूझ के साथ हल किया जाना चाहिए। उन्होंने युवाओं की समस्याओं को नजरअंदाज न करने की चेतावनी दी है।
परीक्षाओं में धांधली और युवाओं का संकट
बसपा सुप्रीमो ने कहा कि मेडिकल समेत तमाम अखिल भारतीय और राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षाओं में लगातार हो रहे पेपर लीक और अनियमितताओं के कारण परीक्षाएं रद्द करना एक गंभीर समस्या बन गई है। इससे युवा और बेरोजगार वर्ग में भारी निराशा और अनिश्चितता का माहौल है। उन्होंने सरकारों से मांग की है कि इस समस्या के समाधान के लिए तत्काल सख्त कदम उठाए जाएं और परीक्षा प्रणाली में सेंध लगाने वाले जिम्मेदार अधिकारियों व तत्वों की जवाबदेही तय करते हुए उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
सरकारी शिक्षा और कोचिंग संस्थानों की स्थिति
मायावती ने टिप्पणी की कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों में गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा के अभाव के कारण निजी कोचिंग संस्थानों का व्यवसायीकरण तेजी से बढ़ा है। उन्होंने कहा कि परिवार अपनी सीमित आय और बढ़ती महंगाई के बावजूद बच्चों की पढ़ाई के लिए भारी आर्थिक बोझ उठा रहे हैं, जो यह साबित करता है कि युवा अपने करियर के प्रति कितने गंभीर हैं। उन्होंने मांग की कि कोचिंग संस्थानों पर प्रभावी व भ्रष्टाचार मुक्त निगरानी रखी जाए, लेकिन इसके समानांतर प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के सरकारी ढांचे को मजबूत करना भी अनिवार्य है।
संविधान के विजन और आंदोलनों पर रुख
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि देश का सर्वांगीण विकास बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के शिक्षित, सुरक्षित और कल्याणकारी भारत के सपने के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि आंदोलनों के प्रति दमनकारी के बजाय सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाकर समस्याओं का समाधान निकाला जाए। मायावती का मानना है कि यदि सरकारें समय रहते युवाओं की पीड़ा को समझें और सार्थक संवाद करें, तो किसी भी वर्ग को सड़कों पर उतरने या आंदोलन करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। शिक्षित युवा ही देश की असली पूंजी हैं और उनकी नींव मजबूत करना सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है।
