रंभा और श्यामला का पुत्र महिषासुर कैसे बन गया तीनों लोकों का शासक, पढ़िए महिषासुर मर्दिनी की पौराणिक कथा

नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है लेकिन क्या आपको पता है कि मां दुर्गा इस धरती पर अवतरित क्यों हुई हैं. वे महिषासुर वध करने के लिए अवतरित हुई थी. महिषासुर के जन्म की बेहद रोचक कथा है. प्राचीन समय में असुरों के राजा रंभा राज करते थे. उन्होंने एक श्यामला नाम की राजकुमारी से विवाह किया था. श्यामला अत्यंत सुंदर थी लेकिन एक श्राप के कारण उन्हें भैंस का रूप मिल गया. इसके बाद इन्हीं दोनों के संयोग से महिषासुर नाम के असुर का जन्म हुई. फिर उन्होंने क्या किया और मां दुर्गा को क्यों अवतरित होनी पड़ी, आइए इस रोचक तस्वीर के माध्यम से आपको यह कथा बताते हैं.
पौराणिक महिषासुरमर्दिनी की रोचक कथा को यहां आर्ट फॉर्म में प्रस्तुत किया जा रहा है. इससे आपको शानदार जानकारी तो मिलेगी ही साथ ही मां दुर्गा के भव्य रुपों का दर्शन भी हो सकेगा.
असुरों के राजा रंभा और श्यामला नाम की एक राजकुमारी, जिसे श्राप के कारण भैंस का रूप मिल गया था एक-दूसरे से प्रेम करने लगे.
उनके पुत्र का नाम महिषासुर रखा गया.
महिषासुर में अपनी इच्छा के अनुसार अलग-अलग रूप धारण करने की शक्ति थी. बाद में इसी शक्ति का इस्तेमाल उसने स्वर्ग में देवताओं से युद्ध करने के लिए किया.
लेकिन देवताओं ने उसे खदेड़ दिया.
…और हर बार उसे वहां से भगा दिया.
इसलिए महिषासुर ने भगवान ब्रह्मा से वरदान पाने की उम्मीद में कठोर तपस्या शुरू कर दी. ब्रह्मा को सर्वोच्च सृष्टिकर्ता माना जाता है.
महिषासुर की वर्षों लंबी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ब्रह्मा उसे वरदान देने के लिए तैयार हो गए. महिषासुर ने अमरता का वरदान मांगा.
जब ब्रह्मा ने अमरता का वरदान देने से इनकार कर दिया, तो चालाक महिषासुर ने ऐसा वरदान मांगा कि कोई भी पुरुष-चाहे वह देवता हो, इंसान हो या असुर-उसे मार न सके.
उसे इतना अहंकार था कि उसे विश्वास ही नहीं था कि कोई महिला उसे मार सकती है.
ब्रह्मा ने उसकी बात मान ली. इससे महिषासुर को विश्वास हो गया कि वह अमर हो गया है. इसके बाद उसने विजय अभियान शुरू किया-सबसे पहले पाताल लोक पर और फिर पृथ्वी पर.
महिषासुर और उसकी असुर सेना इतनी शक्तिशाली हो गई थी कि…
देवता उनका मुकाबला नहीं कर सके और जल्द ही उन्हें स्वर्ग से भी बाहर कर दिया गया.
अंततः देवताओं को हराने के बाद वह तीनों लोकों का शासक बन गया…
…और उसने तीनों लोकों में आतंक का राज कायम कर दिया.
'अब किसी देवता की पूजा नहीं होगी! मैं ही एकमात्र भगवान हूं,' उसने गरजते हुए कहा…
यहां तक कि भगवान ब्रह्मा की भी पूजा नहीं की जानी थी, जिन्होंने महिषासुर को वरदान दिया था.
परेशान देवता स्वर्ग को वापस पाने में मदद के लिए ब्रह्मा के पास पहुंचे.
ब्रह्मा उन्हें समाधान के लिए पालनकर्ता भगवान विष्णु के पास ले गए.
इसके बाद विष्णु उन्हें संहारकर्ता भगवान शिव के पास ले गए…
त्रिदेव और सभी देवताओं के मुख से एक शक्तिशाली प्रकाश निकला, जिससे देवी दुर्गा के स्त्री स्वरूप का निर्माण हुआ.
उनकी दसों भुजाओं में देवताओं द्वारा दिए गए अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र थे-जिनमें भगवान विष्णु का चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल और भगवान ब्रह्मा का कमंडलु शामिल था. उनके वाहन के रूप में एक सिंह को चुना गया.
भयंकर युद्ध शुरू हो गया. महिषासुर ने सबसे पहले चंड और मुंड तथा रक्तबीज जैसे शक्तिशाली असुरों को देवी दुर्गा से मुकाबला करने के लिए भेजा…
जब वे असफल हो गए, तो महिषासुर खुद दुर्गा से युद्ध करने पहुंचा. उसने कई रूप बदले-भैंस से सिंह, फिर हाथी और एक सुंदर पुरुष का रूप धारण किया लेकिन फिर भी दुर्गा ने उसे हरा दिया.
जब महिषासुर अपने भैंस के रूप से बाहर निकल रहा था, तभी देवी दुर्गा ने उस पर अंतिम प्रहार किया.
इस तरह असुरों के राजा महिषासुर का देवी दुर्गा के हाथों वध हुआ. इसके बाद देवी को महिषासुर मर्दिनी कहा जाने लगा.
देवताओं की खुशी के साथ तीनों लोकों में फिर से व्यवस्था और शांति स्थापित हो गई.
