शेयर बाजार की सुस्त शुरुआत, 100 डॉलर के पार कच्चा तेल; IT-ऑटो समेत कई सेक्टर पर नजर

भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को कारोबार की शुरुआत लगभग सपाट स्तर पर हुई। शुरुआती मिनटों में सेंसेक्स करीब 36 अंकों की मामूली गिरावट के साथ 74,727 के स्तर पर कारोबार करता नजर आया, जबकि निफ्टी 8 अंक खिसककर 23,430 के आसपास बना रहा। बाजार खुलते ही ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स क्षेत्र के शेयरों पर बिकवाली का दबाव देखा गया, जिससे मुख्य सूचकांकों की बढ़त थम गई।

ऑटो और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स बने 'टॉप लूजर्स', बैंकिंग शेयरों में दिखी राहत

कारोबार के दौरान निफ्टी ऑटो और निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सबसे अधिक दबाव में रहे। इसके अतिरिक्त फार्मा, मैन्युफैक्चरिंग, रियल्टी, डिफेंस और मेटल सेक्टर के सूचकांक भी लाल निशान में कारोबार करते दिखे। दूसरी तरफ, पीएसयू बैंक, ऑयल एंड गैस, प्राइवेट बैंक और एफएमसीजी सेक्टर के शेयरों ने बाजार को नीचे गिरने से बचाने का प्रयास किया और हरे निशान में बने रहे।

मिडकैप और स्मॉलकैप में मिला-जुला रुख

मझोली और छोटी कंपनियों के शेयरों में भी मिला-जुला रुझान देखने को मिला:

  • निफ्टी मिडकैप 100: 114 अंक (0.18%) घटकर 62,479 के स्तर पर आया।

  • निफ्टी स्मॉलकैप 100: 18 अंकों की हल्की बढ़त के साथ 20,055 के स्तर पर कारोबार करता दिखा।

वैश्विक बाजारों में मंदी का असर, अमेरिकी बाजार भी लाल निशान में बंद

अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिले-जुले और सुस्त संकेत मिल रहे हैं। एशियाई बाजारों में टोक्यो, शंघाई, हांगकांग, बैंकॉक, सोल और जकार्ता के शेयर बाजार गिरावट के साथ लाल निशान में कारोबार कर रहे थे। इससे पहले अमेरिकी बाजारों में भी नरमी का रुख रहा, जहाँ डाओ जोन्स 0.77 प्रतिशत और तकनीकी शेयरों वाला इंडेक्स नैस्डैक 0.64 प्रतिशत टूटकर बंद हुआ।

कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड से बढ़ीं चिंताएं

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, निफ्टी के 23,500 के अहम रेजिस्टेंस स्तर से नीचे फिसलने के कारण तकनीकी ढांचा कमजोर हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) का भाव 101 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने और अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड के बढ़कर 4.83 प्रतिशत होने से अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा दरें बढ़ाने की आशंका गहरा गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यद्यपि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत है, फिर भी यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहती हैं, तो इससे देश की आर्थिक विकास दर और कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है।

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