इंजीनियरिंग से छात्रों का मोहभंग? भोपाल के 6 कॉलेजों में जीरो एडमिशन

भोपाल: मध्य प्रदेश में तकनीकी शिक्षा को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आ रही है, जहां छात्रों का रुझान लगातार इंजीनियरिंग कोर्सेस से कम होता जा रहा है। तकनीकी शिक्षा विभाग की प्रवेश प्रक्रिया के तहत इस समय सीएलसी (कॉलेज लेवल काउंसलिंग) का दूसरा दौर चल रहा है, लेकिन राजधानी भोपाल समेत पूरे प्रदेश के कई इंजीनियरिंग कॉलेजों में स्थिति बेहद खराब है। आलम यह है कि भोपाल के ही आधा दर्जन से अधिक ऐसे कॉलेज हैं, जहां अब तक एक भी छात्र ने प्रवेश नहीं लिया है, और इन संस्थानों का पूरा दारोमदार अब केवल सीएलसी राउंड पर टिका हुआ है।

प्रवेश प्रक्रिया और पारदर्शिता के लिए नया 'सेल्फी नियम'

तकनीकी शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सीएलसी के दूसरे दौर के तहत छात्रों के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया निर्धारित की गई है, जिसके बाद संबंधित कॉलेजों में पहुंचकर प्रवेश प्रक्रिया पूरी की जा रही है। इस बार फर्जीवाड़े और धांधली पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए विभाग ने एक अनूठा और सख्त नियम लागू किया है। इसके तहत प्रवेश लेते समय छात्र के लिए कॉलेज परिसर में अपनी सेल्फी लेकर उसे आधिकारिक पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य कर दिया गया है। इससे यह पुख्ता किया जा रहा है कि जो विद्यार्थी प्रवेश ले रहा है, वह वास्तव में भौतिक रूप से वहां मौजूद है।

प्रदेशभर में 39 हजार से ज्यादा सीटें खाली, कई संस्थानों में ताला

दूसरी काउंसलिंग के आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश के कुल 135 इंजीनियरिंग संस्थानों में उपलब्ध 75 हजार 249 सीटों में से केवल 35 हजार 660 सीटों पर ही विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है, जिसके चलते अभी भी 39 हजार 589 सीटें खाली पड़ी हैं। राजधानी भोपाल के जिन प्रमुख कॉलेजों में अब तक एक भी सीट नहीं भर पाई है, उनमें आइसकॉम इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, भोपाल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट, कैलाश नारायण पाटीदार कॉलेज, राजीव गांधी प्रौद्योगिकी कॉलेज, श्रीराम कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी और स्वामी विवेकानंद कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी शामिल हैं। पिछले एक दशक में राज्य के करीब 64 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो चुके हैं और पिछले साल ही 754 सीटें सरेंडर करनी पड़ी थीं।

आधुनिक कोर्सेस की मांग और छोटे कॉलेजों पर अस्तित्व का संकट

विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक इंजीनियरिंग ब्रांचों के प्रति छात्रों का मोहभंग होने और प्लेसमेंट के अवसर घटने के कारण यह स्थिति पैदा हुई है। वर्तमान समय में छात्र केवल उन्हीं संस्थानों को चुन रहे हैं जहां बेहतर प्लेसमेंट की सुनिश्चितता हो, जबकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग (ML) और ई-मोबिलिटी जैसे नए जमाने के आधुनिक कोर्सेस की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में छोटे और कम पहचान वाले कॉलेजों के सामने अपने अस्तित्व को बचाने का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

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