शुभेंदु अधिकारी अकेले नहीं: इन बाहरी चेहरों पर भी BJP ने जताया CM के लिए भरोसा

कोलकाता | पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार, 9 मई का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज हो गया है। शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली, जिसके साथ ही राज्य में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार का विधिवत गठन हो गया है। दशकों तक कांग्रेस, वामपंथी गठबंधन और फिर तृणमूल कांग्रेस के शासन को देख चुके बंगाल के लिए यह सत्ता परिवर्तन एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है। हालांकि भाजपा का यह शासनकाल कितना लंबा और प्रभावी होगा, यह तो आने वाला वक्त तय करेगा, लेकिन वर्तमान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का अपना राजनीतिक इतिहास यह बताता है कि वे बंगाल की पुरानी सत्ता संरचनाओं के सबसे मंझे हुए खिलाड़ियों में से एक रहे हैं।

कांग्रेस और टीएमसी के 'गढ़' से निकलकर भाजपा के सारथी तक

शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर काफी विविधतापूर्ण रहा है। उनके करियर की शुरुआत 1995 में कांग्रेस पार्टी से हुई थी, जब उन्होंने अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए पार्षद का चुनाव जीता था। लेकिन जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से नाता तोड़कर तृणमूल कांग्रेस (TMC) का गठन किया, तो शुभेंदु और उनका परिवार टीएमसी के संस्थापक स्तंभों में शामिल हो गया। एक समय वह भी था जब शुभेंदु को ममता बनर्जी के बाद पार्टी का नंबर-2 नेता माना जाता था। उन्होंने न केवल नंदीग्राम आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई, बल्कि 'जंगल महल' जैसे कठिन क्षेत्रों में टीएमसी को मजबूती प्रदान की। हालांकि, 2020 में अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के दखल के कारण उनके और ममता बनर्जी के बीच दूरियां बढ़ गईं, जिसके परिणामस्वरूप 2021 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। आज उनकी यह मेहनत उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले आई है।

भाजपा की 'बाहरी बनाम अनुभवी' चेहरों पर दांव लगाने की नीति

शुभेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना भाजपा की उस रणनीति की पुष्टि करता है, जिसमें वह उन नेताओं पर भरोसा जता रही है जो मूल रूप से आरएसएस या भाजपा कैडर से नहीं आए हैं। यह सिलसिला केवल बंगाल तक सीमित नहीं है; पिछले महीने ही बिहार में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने स्पष्ट कर दिया था कि वह 'बाहरी' लेकिन जनाधार वाले नेताओं को शीर्ष पद देने से परहेज नहीं करेगी। सम्राट चौधरी भी राजद और जदयू जैसी पार्टियों का हिस्सा रह चुके हैं। भाजपा का यह दृष्टिकोण बताता है कि पार्टी अब उन राज्यों में जहाँ उसका संगठन पारंपरिक रूप से कमजोर रहा है, वहाँ अन्य दलों के कद्दावर और अनुभवी नेताओं को मुख्यमंत्री बनाकर अपनी स्वीकार्यता और सत्ता की पकड़ मजबूत कर रही है।

असम से मणिपुर तक: 'दलबदल' से 'नेतृत्व' की सफल गाथा

भाजपा ने देशभर में कई राज्यों में अन्य दलों से आए नेताओं को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी है। पूर्वोत्तर में यह प्रयोग सबसे सफल रहा है:

  • असम: हिमंत बिस्व सरमा और सर्वानंद सोनोवाल दोनों ने ही क्रमशः कांग्रेस और एजीपी से अपना करियर शुरू किया और असम में भाजपा की नींव मजबूत की।
  • अरुणाचल प्रदेश: गेगॉन्ग अपांग और पेमा खांडू जैसे नेताओं ने कांग्रेस की पृष्ठभूमि से आकर भाजपा की सरकारें चलाईं। विशेषकर पेमा खांडू ने तो पूरी की पूरी कैबिनेट के साथ भाजपा में शामिल होकर इतिहास रचा था।
  • मणिपुर और त्रिपुरा: एन. बीरेन सिंह (पूर्व कांग्रेसी) और माणिक साहा (पूर्व कांग्रेसी) ने भी अपनी पुरानी पार्टियों को छोड़कर भाजपा को सत्ता तक पहुँचाया और मुख्यमंत्री बने।
  • कर्नाटक और बिहार: बसवराज बोम्मई ने जनता दल से भाजपा में आकर कमान संभाली, तो वहीं सम्राट चौधरी ने भी कई क्षेत्रीय दलों का सफर तय कर बिहार के मुख्यमंत्री का पद हासिल किया।

आज शुभेंदु अधिकारी भी इसी प्रभावशाली सूची का हिस्सा बन गए हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि भाजपा अब विचारधारा के साथ-साथ 'प्रशासनिक अनुभव' और 'चुनावी जिताऊ क्षमता' को सबसे ऊपर रख रही है।

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