पानी को लेकर बढ़ा तनाव, सिंधु समझौते पर पाकिस्तान ने उठाया कदम

इस्लामाबाद। सिंधु जल समझौते के क्रियान्वयन को लेकर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की छटपटाहट एक बार फिर वैश्विक मंच पर उजागर हुई है। पाकिस्तान ने सीधे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का रुख करते हुए भारत पर इस ऐतिहासिक जल संधि की शर्तों के उल्लंघन का सनसनीखेज आरोप मढ़ा है। इस्लामाबाद प्रशासन का तर्क है कि भारत द्वारा चिनाब नदी के जल तंत्र पर बनाई जा रही कुछ बुनियादी ढांचागत जल परियोजनाएं इस द्विपक्षीय समझौते की मूल भावना के सर्वथा विपरीत हैं। पाकिस्तान को यह डर सता रहा है कि भारत के इन कदमों से उसके हिस्से के पानी, कृषि, खाद्य सुरक्षा और पूरी अर्थव्यवस्था पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जिससे देश के सामने जीवन-यापन का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। इस सिलसिले में पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार की ओर से सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष को एक आधिकारिक विरोध पत्र भी भेजा गया है, जिसे संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी राजदूत आसिम इफ्तिखार अहमद ने यूएनएससी की वर्तमान अध्यक्ष व कोलंबिया की राजनयिक लियोनोर जालाबाता टोरेस के समक्ष प्रस्तुत किया।
चिनाब नदी के प्राकृतिक बहाव को प्रभावित करने का आरोप और यूएन से हस्तक्षेप की गुहार
पाकिस्तानी पक्ष का मुख्य आरोप यह है कि भारत चिनाब नदी प्रणाली पर संचालित अपनी दो बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के माध्यम से पश्चिमी क्षेत्र की नदियों के प्राकृतिक जल प्रवाह और उसके उपभोग के दशकों पुराने स्थापित ढांचे को कृत्रिम रूप से बदलने की कोशिश कर रहा है। इस्लामाबाद के राजनयिकों का कहना है कि नई दिल्ली की ये निर्माण गतिविधियां सिंधु जल संधि के नियमों के दायरे में नहीं आती हैं और इससे संपूर्ण दक्षिण एशियाई क्षेत्र की स्थिरता और शांति दांव पर लग सकती है। पाकिस्तानी राजदूत ने सोशल मीडिया हैंडल 'एक्स' पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि उन्होंने सुरक्षा परिषद से इस संवेदनशील जल विवाद का तुरंत संज्ञान लेने तथा भारत को इन कथित तकनीकी उल्लंघनों के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर जवाबदेह बनाने की पुरजोर अपील की है। इसके साथ ही पाकिस्तानी तंत्र ने हमेशा की तरह इस मुद्दे की आड़ में कश्मीर से जुड़े पुराने राग को भी अलापने का प्रयास किया।
एक वर्ष से अधिक समय से जारी है गतिरोध, भारत ने जल संसाधनों पर नियंत्रण की बात को नकारा
दोनों देशों के बीच इस रणनीतिक मुद्दे को लेकर पिछले एक साल से भी अधिक समय से तीखा कूटनीतिक गतिरोध चल रहा है। विदेश मंत्री इशाक डार ने इससे पहले अप्रैल महीने में भी संयुक्त राष्ट्र को इसी तरह का एक शिकायती पत्र प्रेषित किया था, जिसमें उन्होंने भारत सरकार द्वारा सिंधु जल संधि की बैठकों को प्रभावी रूप से स्थगित रखने के एक वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए इसके गंभीर मानवीय दुष्परिणामों की चेतावनी दी थी। हालिया रिपोर्टों में पाकिस्तान ने यह नया दावा भी ठोक दिया है कि भारत सिंधु नदी तंत्र से जुड़ी कुल 17 परियोजनाओं पर समानांतर काम कर रहा है, जो भविष्य में नई दिल्ली को इन महत्वपूर्ण जल संसाधनों पर एकाधिकार और पूर्ण नियंत्रण की शक्ति दे सकती हैं। दूसरी ओर, भारत सरकार ने पाकिस्तान के इन सभी दावों को पूरी तरह निराधार बताते हुए बार-बार स्पष्ट किया है कि उसकी सभी परियोजनाएं पूरी तरह वैध हैं और वे अंतरराष्ट्रीय नियमों व देश की अपनी विकासात्मक जरूरतों के बिल्कुल अनुकूल हैं।
वर्ष 1960 की ऐतिहासिक संधि का सफर और पहलगाम आतंकी हमले के बाद बदला रुख
उल्लेखनीय है कि विश्व बैंक की सीधी मध्यस्थता में साल 1960 में हस्ताक्षरित हुई सिंधु जल संधि दोनों पड़ोसी देशों के बीच नदियों के पानी के न्यायसंगत बंटवारे की कानूनी रूपरेखा तय करती है। इस ऐतिहासिक समझौते के तहत रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों के पानी के इस्तेमाल का पूर्ण अधिकार भारत को सौंपा गया था, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी तीन पश्चिमी नदियों का अधिकांश पानी पाकिस्तान के हिस्से में तय किया गया था। बीते कई दशकों तक यह संधि दोनों देशों के बीच बेहद सफल और अटूट मानी जाती रही, जो भीषण युद्धों और कूटनीतिक कड़वाहट के दौर में भी कभी नहीं रुकी। परंतु, साल 2025 में हुए भीषण पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद भारत का रुख बेहद कड़ा हो गया। नई दिल्ली ने इस कायरतापूर्ण हमले के लिए पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हुए इस जल समझौते के भविष्य को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया, जिसने पाकिस्तान की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
