देश के 1,00,843 स्कूल ऐसे जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे, यह है सच्चाई

नई दिल्ली। देशभर में जेन अल्फा द्वारा अपनी बुनियादी जरूरतों को लेकर किए जा रहे विरोध-प्रदर्शन अब केवल स्थानीय मुद्दे नहीं रह गए। हाल ही में एक रिपोर्ट के आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि छात्र जिनके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, वे देश के शिक्षा तंत्र में व्यापक स्तर पर मौजूद हैं। जेन जी के बाद जेन अल्फ (स्कूली बच्चे) भी शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं के अभाव के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्रों के प्रदर्शन की तस्वीरें सामने आईं हैं। यूपी के हमीरपुर में करीब 300 बच्चों ने अपने स्कूल तक एक पक्की सड़क की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट ऑफिस तक 6 किलोमीटर का पैदल मार्च निकाला। वहीं लखनऊ में 250 छात्राओं ने शिक्षकों की भारी किल्लत और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में प्रदर्शन किया। जयपुर में दिव्यांग छात्रों ने सफाई, क्लासरूम की जर्जर स्थिति और दिव्यांग-अनुकूल शौचालयों की मांग उठाई।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के कुल 14,66,682 स्कूलों में से 68.4 फीसदी राज्य सरकारों द्वारा चलाए जाते हैं। रिपोर्ट देश के शिक्षा तंत्र की कई चिंताजनक परतें खोलती है।
रिपोर्ट के मुताबिक देश के 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं और इन स्कूलों में 29 लाख से ज्यादा बच्चे हैं, जबकि अकेले कर्नाटक में ऐसे 8,042 स्कूल हैं। इसके विपरीत, देश के 5,663 स्कूलों में एक भी छात्र का दाखिला नहीं है, लेकिन वहां 20,667 शिक्षक तैनात हैं। डिजिटल और भौतिक असमानता की बात करें तो देश के केवल 67.4 फीसदी स्कूलों में इंटरनेट और 63.1 फीसदी में चालू कंप्यूटर हैं, सिर्फ 7.1 फीसदी स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी है, और तमिलनाडु में 99 फीसदी इंटरनेट कवरेज होने के बावजूद सरकारी स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी महज 0.8 फीसदी है।
इसके अलावा दिव्यांग छात्रों के लिए चुनौतियां बनी हुई हैं क्योंकि केवल 40.1 फीसदी स्कूलों में दिव्यांग-अनुकूल टॉयलेट हैं, हालांकि 79.7 फीसदी स्कूलों में रैंप उपलब्ध हैं। आंकड़े बताते हैं कि इंटरनेट, 79.2 फीसदी बनाम 63.1 फीसदी और चालू कंप्यूटरों की उपलब्धता में प्राइवेट बिना-सहायता प्राप्त स्कूल आगे हैं। इसके विपरीत भौतिक पहुंच यानी रैंप, 88.2 फीसदी बनाम 60.4फीसदी और हैंडरेल सुविधाओं के मामले में सरकारी स्कूल बेहतर स्थिति में हैं।
वहीं, लड़कियों के लिए चालू शौचालय की उपलब्धता दोनों क्षेत्रों में 95 फीसदी से ज्यादा है। छात्र-शिक्षक अनुपात भले ही राष्ट्रीय स्तर पर 24 हो, लेकिन राज्यों के बीच भारी अंतर है। जहां झारखंड में प्रति शिक्षक 36 छात्र हैं, वहीं पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 19.7 है। छात्रों का यह गुस्सा सीधे तौर पर शिक्षा प्रणाली की इन गहरी विषमताओं की ओर इशारा करता है।

Leave a Reply