गागरोन किले की कहानी है बेहद खास, 14 युद्ध और दो जौहर से जुड़ा है इसका इतिहास

झालावाड़। राजस्थान के झालावाड़ शहर से मात्र चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित गागरोन किला भारत के सबसे अद्भुत और अदम्य किलों में गिना जाता है। इतिहास के 14 भीषण युद्धों और दो गौरवशाली जौहरों का मूक साक्षी रहा यह दुर्ग राजस्थान की अद्वितीय स्थापत्य कला और शौर्य गाथाओं को अपने भीतर समेटे हुए है। बिना किसी नींव के बड़ी-बड़ी चट्टानों पर सीधे खड़ा यह दुर्गम किला तीनों ओर से कालीसिंध और आहु नदियों के संगम से घिरा हुआ है। अपनी इसी विशेष प्राकृतिक सुरक्षा और भव्य बनावट के कारण गागरोन को देश का सर्वश्रेष्ठ जल दुर्ग माना जाता है, जो आज भी अतीत के संघर्षों की अमर ज्वाला को जीवित रखे हुए है।
परमारों और खींची शासकों का गौरवशाली इतिहास तथा यूनेस्को की मान्यता
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार इस अभेद्य किले का प्रारंभिक निर्माण 1195 ईस्वी में परमार वंश के बिजलदेव द्वारा करवाया गया था, जिसे पूर्व में ढोड़ागढ़ के नाम से जाना जाता था। बाद में चौहान वंश के प्रतापी राजा देवन सिंह खींची ने इस पर अधिकार कर इसका नाम गागरोन रखा। 1300 ईस्वी में यहाँ के साहसी शासक जेतसी ने अलाउद्दीन खिलजी के भीषण आक्रमण को पूरी तरह विफल कर दिया था। इस ऐतिहासिक महत्व और बेजोड़ वास्तुकला के कारण ही 21 जून 2013 को कंबोडिया में आयोजित यूनेस्को की वैश्विक बैठक में गागरोन किले को 'विश्व धरोहर' (World Heritage Site) का दर्जा प्रदान किया गया था।
14 युद्धों की गाथा और वीरांगनाओं के दो ऐतिहासिक जौहर
गागरोन किले की दीवारें वीरों के बलिदान और क्षत्राणियों के महान स्वाभिमान की प्रतीक हैं। 1423 ईस्वी में जब मांडू के सुल्तान होशंगशाह ने अपनी विशाल सेना के साथ किले पर चढ़ाई की, तो राजा अचलदास खींची ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की। इसके पश्चात अपनी आन-बान-शान की रक्षा के लिए हजारों वीरांगनाओं ने अग्नि से धधकते कुंड में छलांग लगाकर पहला जौहर रचा। वहीं दूसरा जौहर 1444 ईस्वी में मालवा के सुल्तान मोहम्मद खिलजी के आक्रमण के दौरान हुआ, जिसके बाद सुल्तान ने किले का नाम बदलकर मुस्तफाबाद रखा था।
हिंदू-मुस्लिम सद्भाव की मिसाल और धार्मिक आस्था का केंद्र
ऐतिहासिक और सैन्य दृष्टिकोण के अलावा यह दुर्ग धार्मिक एवं सांस्कृतिक सौहार्द का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। यहाँ के पूर्व प्रतापी राजा प्रताप सिंह ने राजपाट त्यागकर संत रामानंद का शिष्यत्व ग्रहण किया, जिन्हें आज संत पीपाजी के रूप में दर्जी समाज अपना आराध्य देव मानता है। दूसरी ओर, इसी किले के परिसर में सूफी संत पीर मिट्ठे शाह की मजार स्थित है, जहाँ हर वर्ष सभी धर्मों के श्रद्धालु माथा टेकने आते हैं। इसके अतिरिक्त, प्रसिद्ध लोकगाथा 'ढोला-मारू' के नायक का संबंध भी इसी ऐतिहासिक गागरोन क्षेत्र से जोड़ा जाता है।
त्रि-स्तरीय परकोटा और मिनी लंका के रूप में विशेष पहचान
गागरोन किले की स्थापत्य संरचना इतनी अनूठी है कि यह दुश्मनों के लिए हमेशा एक पहेली बना रहा। पहाड़ों के समान ऊँचाई और तीन ओर विशाल परकोटों तथा गहरी जल-खाई से घिरे होने के कारण इसे 'मिनी लंका' भी कहा जाता है। किले के चारों ओर चार से पांच मीटर ऊँचे और विशाल चट्टानों से बने परकोटे हैं, जिन्हें भेदना असम्भव था। दुर्ग के भीतर मदनमोहन मंदिर, मधुसूदन मंदिर, जनाना महल, अचलदास का महल, दरी खाना, विशाल जौहर कुंड और गणेश पोल जैसी ऐतिहासिक इमारतें आज भी पर्यटकों को उस दौर की भव्यता और गौरवशाली संस्कृति का बोध कराती हैं।
