नगरीय निकायों के कायाकल्प और वित्तीय सुदृढ़ीकरण के लिये दो दिवसीय “शहरी सुधार कार्यशाला” का हुआ समापन

भोपाल : नगरीय विकास एवं आवास विभाग के तत्वावधान में भोपाल के भौरी स्थित सुंदरलाल पटवा राष्ट्रीय नगर प्रबंधन संस्थान (SPNIUM) में आयोजित दो दिवसीय "शहरी सुधार कार्यशाला" का शुक्रवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ। 16 और 17 अप्रैल को आयोजित कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के नगरीय निकायों की कार्यक्षमता को सुदृढ़ करना, वित्तीय संसाधनों में वृद्धि के मार्ग प्रशस्त करना तथा नागरिक सेवाओं के बेहतर प्रबंधन के लिये आधुनिक नवाचारों और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का साझाकरण करना रहा। इस बौद्धिक समागम में प्रदेश के विभिन्न निकायों के वरिष्ठ अधिकारी, तकनीकी विशेषज्ञ और विषय-विशेषज्ञों ने भविष्य के शहरी परिदृश्य को बेहतर बनाने के लिए गंभीर विचार-विमर्श किया।

कार्यशाला के प्रथम दिन का केंद्र बिंदु नगरीय निकायों का आर्थिक सुदृढ़ीकरण और राजस्व वृद्धि रहा। इस दौरान शहरी सुधार, भूमि मुद्रीकरण और वित्तीय प्रबंधन के विविध आयामों पर व्यापक प्रकाश डाला गया। सूरत नगर निगम के उप आयुक्त नीलेश पटेल ने शोधित जल के प्रभावी पुन: उपयोग और उसके सफल क्रियान्वयन के मॉडल को साझा किया। वहीं, पिंपरी-चिंचवड़ नगर निगम के संयुक्त नगर अभियंता सुनील अंशीराम भगवानी ने राजस्व वृद्धि के व्यावहारिक तरीकों को रेखांकित किया। प्रथम दिन के विभिन्न तकनीकी सत्रों में 'क्रेडिटवर्थी सिटीज़' और सस्टेनेबल अर्बन फाइनेंस जैसे विषयों के साथ डिजिटल उपकरणों जैसे यूसीएफ, एईबीएएस और स्पैरो के माध्यम से पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने पर विस्तृत चर्चा की गई।

कार्यशाला के दूसरे दिन नगरीय विकास एवं आवास आयुक्त संकेत भोंडवे ने प्रतिभागियों को भविष्योन्मुखी मार्गदर्शन प्रदान करते हुए विभाग की प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया। उन्होंने सभी नगरीय निकायों को अपने क्षेत्रों में डिजिटल लेनदेन को अनिवार्य रूप से बढ़ावा देने के निर्देश दिए, जिससे वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। भोंडवे ने मुख्यमंत्री अधोसंरचना योजना और अमृत (AMRUT) द्वितीय चरण के कार्यों की प्रगति की समीक्षा करते हुए इन्हें समयबद्ध सीमा में पूर्ण करने पर विशेष बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि नागरिकों को स्वच्छ और गुणवत्तापूर्ण पेयजल उपलब्ध कराना शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है, जिसके लिए "स्वच्छ जल अभियान" के तहत लीकेज सुधार और जल शुद्धिकरण के कार्यों में कोई शिथिलता नहीं बरती जानी चाहिए। आगामी स्वच्छता सर्वेक्षण की चर्चा करते हुए आयुक्त ने निर्देश दिए कि इसे "मिशन मोड" में लिया जाए और "मेरा वार्ड नंबर एक" जैसे जन-भागीदारी वाले अभियानों को प्रभावी बनाया जाए। उन्होंने स्वच्छता मित्रों को विभाग की वास्तविक शक्ति बताते हुए उन्हें आवश्यक सुरक्षा उपकरण और पीपीई किट उपलब्ध कराने के प्रति संवेदनशीलता प्रदर्शित करने को कहा।

दूसरे दिन के तकनीकी सत्रों में आधुनिक इंजीनियरिंग समाधानों पर विशेष ध्यान दिया गया। विशेषज्ञ प्रबल भारद्वाज एवं हिमांशु चतुर्वेदी ने लिगेसी वेस्ट और तरल अपशिष्ट प्रबंधन के साथ उत्तर प्रदेश के बृजेश कुमार दुबे ने "फुल डेप्थ रिक्लेमेशन" तकनीक जैसी लागत प्रभावी सड़क निर्माण पद्धतियों की जानकारी साझा की। भूजल विशेषज्ञ डॉ. ए.के. विश्वकर्मा ने "जल गंगा संवर्धन अभियान" के अंतर्गत वर्षा जल संचयन और एक्विफर मैनेजमेंट के माध्यम से जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया। कार्यशाला के उत्तरार्ध में उड़ीसा से आए विशेषज्ञ चिन्मय त्रिपाठी ने 24×7 जल आपूर्ति की केस स्टडी प्रस्तुत करते हुए डिजिटल वाटर मैनेजमेंट की महत्ता बताई। इसके अतिरिक्त, सागर, अशोकनगर, छतरपुर, बालाघाट और पीथमपुर सहित विभिन्न निकायों के अधिकारियों ने अपने स्थानीय स्तर पर किए गए सफल नवाचारों को साझा किया, जो अन्य निकायों के लिए अनुकरणीय सिद्ध होंगे।

कार्यशाला के अंतिम चरण में स्मार्ट मॉनिटरिंग और रोबोटिक पाइपलाइन निरीक्षण जैसी उन्नत तकनीकों के माध्यम से जल प्रणालियों में लागत अनुकूलन पर चर्चा की गई। ललित मोटवानी और बीवीआर शर्मा जैसे विशेषज्ञों ने अत्याधुनिक मशीनों द्वारा पाइपलाइनों के रखरखाव और दक्षता बढ़ाने के गुर सिखाए। समापन सत्र में मध्यप्रदेश में "जल पुन: उपयोग नीति" के लिए एक रणनीतिक रोडमैप प्रस्तुत किया गया, जिसमें जल संरक्षण और सतत शहरी विकास के ढांचे को सुदृढ़ करने के संकल्प के साथ कार्यशाला का समापन हुआ। इस दो दिवसीय मंथन से उपजे विचार प्रदेश के शहरों को आधुनिक, आत्मनिर्भर और जन-सुविधाओं से परिपूर्ण बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होंगे।

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