राहुल की मौत का जिम्मेदार कौन? अवैध ब्रेकर और प्रशासनिक चुप्पी पर परिजनों का सवाल

गाजियाबाद: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के साहिबाबाद क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली एक कॉलोनी में बिना किसी मानक के अवैध रूप से बनाए गए स्पीड ब्रेकर की वजह से गत 7 जून को भोपुरा निवासी 34 वर्षीय राहुल कुमार की दर्दनाक मौत हो गई थी। इस सड़क हादसे के एक दिन बाद जब पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज खंगाली तब जाकर इस अवैध ब्रेकर का खुलासा हुआ था। घटना के बाद से ही पीड़ित परिजनों ने पुलिस और नगर निगम के अधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन आज तक उन्हें न्याय तो दूर, संतोषजनक जवाब तक नहीं मिल पाया है।
आईजीआरएस पोर्टल पर अधिकारियों का गैर-जिम्मेदाराना जवाब
जब स्थानीय स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई, तो मजबूर होकर परिजनों ने इस पूरे मामले की शिकायत उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारिक आईजीआरएस (IGRS) पोर्टल पर दर्ज कराई।
पोर्टल पर जब जवाब सामने आया तो वह बेहद हैरान करने वाला था। नगर निगम के अधिकारियों ने अपने स्पष्टीकरण में अजीबोगरीब तर्क देते हुए लिख दिया कि 'यह जानकारी आईजीआरएस के माध्यम से देना उपयुक्त नहीं है।'
अधिकारियों के इस टालमटोल वाले रवैये से शोकाकुल परिवार और स्थानीय नागरिकों में प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ भारी रोष व्याप्त है।
आपको बता दें कि यह पूरा दर्दनाक हादसा शालीमार गार्डन थाना क्षेत्र के राजेंद्र नगर सेक्टर-2 स्थित आरएम ब्लॉक सोसायटी के सामने सात जून की देर रात पेश आया था, जिसमें टीलामोड़ के भोपुरा निवासी राहुल कुमार गंभीर रूप से घायल हो गए थे और बाद में उनकी मौत हो गई थी।
परिजनों के तीखे सवाल और नगर निगम की चुप्पी
मृतक राहुल के साले सुमित कुमार ने बताया कि हादसे की असल वजह बना यह अवैध ब्रेकर सोसायटी की आरडब्ल्यूए (RWA) द्वारा बनवाया गया था। परिवार के लोगों का केवल इतना कहना है कि वे सिर्फ यह जानना चाहते थे कि:
यह ब्रेकर किसकी अनुमति से और किसने बनवाया था?
क्या इसे बनाने में सड़क निर्माण के तय मानकों का पालन किया गया था?
हादसे के ठीक अगले ही दिन बिना किसी को बताए उस ब्रेकर को रातों-रात क्यों हटा दिया गया?
इस स्पीड ब्रेकर से पहले कोई चेतावनी बोर्ड (साइनबोर्ड) क्यों नहीं लगाया गया था?
सुमित का कहना है कि उन्होंने पोर्टल पर कोई ऐसा गोपनीय या संवेदनशील सवाल नहीं पूछा था जिससे राष्ट्र की सुरक्षा को कोई खतरा पैदा होता। यदि आम जनता के ऐसे सामान्य सवालों के जवाब भी नहीं दिए जाने हैं, तो फिर इस तरह के शिकायत निवारण पोर्टलों का क्या औचित्य रह जाता है?
नगर आयुक्त से भी नहीं मिलने दिया गया
परिजनों का गंभीर आरोप है कि इस मामले में न्याय की गुहार लगाने के लिए वे दो से तीन बार नगर निगम मुख्यालय पहुंचे और नगर आयुक्त से मिलने का प्रयास किया, लेकिन सुरक्षा गार्डों और कर्मचारियों ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया। कभी मीटिंग में होने तो कभी औचक निरीक्षण पर बाहर होने का बहाना बनाकर उन्हें हर बार बैरंग लौटा दिया गया, जिससे साफ जाहिर होता है कि जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे मामले में अपनी लापरवाही छिपाने का प्रयास कर रहे हैं।
