अंडरवर्ल्ड का गढ़ क्यों बना मुंबई, क्या है इसके पीछे की कहानी?

मुंबई। भारत में जब भी संगठित अपराध और अंडरवर्ल्ड का जिक्र होता है, तो सबसे पहले मुंबई का नाम सामने आता है। हाजी मस्तान से लेकर दाऊद इब्राहिम तक, इस शहर ने ऐसे कई कुख्यात डॉन दिए हैं जिनकी धमक देश की सीमाओं से बाहर तक महसूस की गई। इसके पीछे केवल बंदरगाह होना ही एकमात्र कारण नहीं था, बल्कि कई ऐसी भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां थीं जिन्होंने मिलकर मुंबई को अपराध की दुनिया का गढ़ बना दिया।

सुनहरे बंदरगाह से तस्करी की शुरुआत

ब्रिटिश काल से ही मुंबई का बंदरगाह देश का मुख्य व्यावसायिक केंद्र रहा है, जो यहां के बड़े निर्यात का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करता था। इसकी प्राकृतिक और सुरक्षित बनावट बड़े जहाजों को हर मौसम में ठहरने की सुविधा देती थी। इसी वजह से पचास और साठ के दशक में अरब सागर के रास्ते सोने की भारी तस्करी शुरू हुई। मुंबई और दुबई के बीच तस्करों का एक मजबूत नेटवर्क तैयार हुआ, जिसमें सोना, चांदी और इलेक्ट्रॉनिक सामान लाए जाते थे। बंबई डॉक पर कुली का काम करने वाले हाजी मस्तान ने यहीं से तस्करी की दुनिया में कदम रखा था। इसके विपरीत, कोलकाता के बंदरगाह पर सिल्ट जमने के कारण बड़े जहाजों को आने में परेशानी होती थी और दिल्ली में समुद्र न होने के कारण अंतरराष्ट्रीय तस्करी का कोई प्राकृतिक मार्ग नहीं था।

कपड़ा मिलों की तबाही और युवाओं का भटकना

कभी 'भारत का मैनचेस्टर' कहे जाने वाले मुंबई में सूती कपड़ा मिलों का बोलबाला था। लेकिन अस्सी के दशक के शुरुआती सालों में लंबी मिल हड़ताल के बाद पूरा उद्योग ठप हो गया। इस संकट के कारण हजारों मजदूरों की आजीविका छिन गई और कई मिलें हमेशा के लिए बंद हो गईं। आर्थिक तंगी और बेबसी के इस दौर में कई परिवारों के युवा अपराध के रास्ते पर चल पड़े। मुंबई के कई बड़े गैंगस्टर इन्हीं मिल मजदूरों के परिवारों से ताल्लुक रखते थे, जिससे अंडरवर्ल्ड को कम उम्र और हताश युवाओं की एक बड़ी फौज आसानी से मिल गई।

बॉलीवुड और काले धन का अनूठा मेल

नब्बे के दशक तक फिल्म उद्योग को पारंपरिक बैंकों से आसानी से वित्तीय मदद नहीं मिलती थी। फिल्मों के निर्माण के लिए सारा पैसा निजी साहूकारों और अवैध कमाई करने वालों से आता था। तस्करों और डॉन के लिए यह अपनी काली कमाई को सिनेमा के जरिए सफेद करने का सबसे बड़ा जरिया बन गया। हाजी मस्तान से लेकर दाऊद इब्राहिम तक ने फिल्मों में बड़े पैमाने पर पैसा लगाया और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के जरिए उसे वैध बनाया। बाद में वसूली और धमकियों का दौर भी शुरू हुआ, जिससे फिल्म जगत पर अपराधियों की पकड़ मजबूत हो गई।

पुलिस की पहुंच से दूर तंग बस्तियां

दक्षिण मुंबई के डोंगरी, भेंडी बाजार, नागपाड़ा और धारावी जैसे घनी आबादी वाले इलाके और संकरी गलियां अपराधियों के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाने साबित हुए। इन बस्तियों में गलियां इतनी तंग थीं कि पुलिस के लिए किसी वांछित तक पहुँचना बेहद जोखिम भरा होता था। इसके अलावा विशाल डॉकयार्ड की मौजूदगी के कारण अवैध गतिविधियों को अंजाम देना और छिपना तस्करों के लिए आसान हो जाता था।

अपराध को कॉरपोरेट रूप देने वाली डी-कंपनी

पुराने दौर के तस्करों के मुकाबले दाऊद इब्राहिम ने अपराध की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया। सत्तर के दशक के आखिर में उसने स्थानीय युवकों को जोड़कर एक संगठित सिंडिकेट तैयार किया जिसे 'डी-कंपनी' नाम दिया गया। उसने अपराध को पेशेवर रूप देते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाया। बाद में देश छोड़कर विदेश से ही अपने आपराधिक साम्राज्य का संचालन करते हुए उसने इसे एक आधुनिक नेटवर्क में बदल दिया, जिसके तार वैश्विक आतंकवाद से भी जुड़ गए।

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