ग्वालियर सीट बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न, तोमर के सामने पुराना उम्मीदवार लेकिन चुनौती नई

लोकसभा चुनाव 2019 में इस बार खंडवा में सियासी पारा अपने पूरे उफान पर है. पहले कांग्रेस में खंडवा सीट पर अरुण यादव का जमकर विरोध हो रहा था, जिस कारण मैदान में उन्हें शिकस्त देने के लिए बुरहानपुर के निर्दलीय विधायक ठाकुर सुरेंद्र सिंह ने अपनी पत्नी को मैदान में उतारा. वहीं अरुण यादव ने ऐसी राजनीतिक विसात बिछाई जिससे ठाकुर सुरेंद्र सिंह को अपनी चाल पीछे लेनी पड़ी.

चंद दिनों पहले तक खंडवा लोकसभा सीट पर इस बार कांग्रेस के अंदर प्रत्याशी चयन के बाद घमासान मचा हुआ था. एक तरफ जहां बीजेपी ने वर्तमान सांसद नंदकुमार सिंह चौहान पर फिर से भरोसा जताया है, वहीं कांग्रेस ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण यादव को मैदान में उतारा है.

बुरहानपुर के निर्दलीय विधायक ठाकुर सुरेंद्र सिंह ने खंडवा और बुरहानपुर में अरुण यादव से असंतुष्ट होकर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का नेतृत्व करते हुए अरुण यादव के खिलाफ अपनी पत्नी जयश्री ठाकुर को मैदान में उतारा. बाकायदा भगवान की पूजा-अर्चना के बाद गुरुवार को बुरहानपुर विधायक ने अपनी पत्नी का नामांकन दाखिल करवाया.

ठाकुर सुरेंद्र सिंह का आरोप है कि अरुण यादव की छवि जनता में लोकप्रिय नहीं है. सांसद रहते हुए उन्होंने जनता के लिए कुछ भी नहीं किया. इसलिए उनके खिलाफ मैदान में उन्हें अपनी पत्नी को उतारना पड़ा.

ठाकुर सुरेंद्र सिंह के खुलेआम इस विरोध ने अरुण यादव की नींद उड़ा दी. ठाकुर सुरेंद्र सिंह को मनाने के लिए पूरी खंडवा से भोपाल तक पूरी कांग्रेस एक हो गई, लेकिन वो टस से मस नहीं हो रहे थे. हालांकि कमलनाथ के समझाने पर यह विरोध खत्म हुआ और ठाकुर सुरेंद्र सिंह को अपनी पत्नी का नाम वापस लेना पड़ा. जयश्री ठाकुर के मुकाबले से बाहर होने से अब सीधा मुकाबला कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव और बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के बीच है. नंदकुमार सिंह चौहान जहां 7वीं बार सांसद के लिए मुकाबले में खड़े हुए हैं, वहीं अरुण यादव चौथी बार.

खंडवा बीजेपी प्रत्याशी नंदकुमार सिंह चौहान की बात करें तो इनका राजनीतिक करियर काफी लंबा रहा है. खंडवा से ये पिछले 5 बार से सांसद रहे हैं लेकिन इन 25 सालों में लोकसभा में खंडवा की हितों को लेकर इनके द्वारा एक भी सवाल नहीं उठाया गया. सांसद होने के नाते खंडवा के जिस आरूद गांव को इन्होंने गोद लिया था, लेकिन आज तक विकास की राह देख रहा है. बच्चों के लिए न तो ढंग का स्कूल बन पाया और ना ही गांव में जल संकट दूर हुआ.
वहीं कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और खंडवा से लोकसभा प्रत्याशी अरुण यादव को राजनीति विरासत में मिली है. इसलिए 2008 में पहली बार खरगोन से सांसद बनने के बाद उन्हें केंद्र में कांग्रेस की सरकार में मंत्री पद से सुशोभित किया गया. फिर जब दोबारा 2009 में लोकसभा चुनाव हुए तब उन्होंने नंदकुमार सिंह को करीब 50 हजार वोटों से हराया. मंत्री बनने के बावजूद उन्होंने 5 वर्षों में क्षेत्र की जनता के लिए कुछ भी नहीं किया. यही कारण है कि जब 2014 में उन्हें तीसरी बार टिकट मिला तो नंदकुमार सिंह चौहान ने उन्हें 2 लाख से ज्यादा वोटों से मात दी. अरुण यादव का कहना है कि उन्होंने सांसद रहते जितना 5 वर्षों में विकास किया है उतना नंदकुमार सिंह ने 30 सालों में भी नहीं किया.
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ग्वालियर ने देश को संगीत के महान साधक दिए तो सियासत के नायक भी दिए. ग्वालियर घराने और ख्याल घरानों से निकला संगीत आज देशभर में सरगम की गूंज रखता है तो ग्वालियर की मिट्टी से राजनीति के नामचीन चेहरों ने ग्वालियर को नई पहचान दी है. यही वजह है कि देश की हाईप्रोफाइल और वीवीआईपी लोकसभा सीटों में ग्वालियर शुमार करता है.

पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी और सिंधिया परिवार की वजह से से ग्वालियर की अहमियत भारतीय राजनीति में बढ़ जाती है. ग्वालियर से अटल बिहारी वाजपेयी, राजमाता विजयराजे सिंधिया, यशोदाराजे सिंधिया और माधवराव सिंधिया जैसे दिग्गज सांसद चुने जा चुके हैं.
पिछले तीन लोकसभा चुनावों से यहां बीजेपी की लगातार जीत हो रही है. लेकिन इस बार ग्वालियर में कांटे की टक्कर दिखाई पड़ सकती है. इसकी बड़ी वजह ये है कि 15 साल बाद मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी है और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में बड़ी भूमिका निभाई है.
उनके प्रभाव वाली लगभग सभी सीटों में कांग्रेस को जीत मिली है. यही वजह बीजपी के लिए मुश्किल तब खड़ी कर सकती जब कि लोकसभा चुनाव में भी ग्वालियर का वोटर विधानसभा चुनाव की तरह ही व्यवहार करे. वैसे भी ग्वालियर पर किसी राजनीतिक दल का उतना असर नहीं रहा जितना यहां पर ग्वालियर घराने का असर है.
हालांकि साल 2001 में माधव राव सिंधिया के निधन के बाद ग्वालियर में बीजेपी मजबूत होना शुरू हुई. बीजेपी ने यहां से यशोदाराजे सिंधिया को उपचुनाव में टिकट दिया जिसमें वो विजयी हुईं और फिर उसके बाद साल 2009 में यशोदारजे सिंधिया को बीजेपी ने एक बार फिर टिकट दिया और वो चुनाव जीतीं.

ग्वालियर सीट पर कांग्रेस को 8 बार, बीजेपी को 4 बार और जनसंघ को 2 बार जीत मिली है. हालांकि पिछले 3 चुनावों से यहां बीजेपी जीतती आ रही है. इस बार भी यहां मुकाबला बीजेपी बनाम कांग्रेस है.

कौन हैं प्रत्याशी

ग्वालियर से वर्तमान में मोदी सरकार के कैबिनेट मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर सांसद हैं. बीजेपी ने नरेंद्र सिंह तोमर पर दोबारा दांव खेला है जबकि कांग्रेस ने अशोक सिंह को टिकट दिया है.
कौन हैं नरेंद्र सिंह तोमर

56 साल के नरेंद्र सिंह तोमर मोदी मंत्रीमंडल में केंद्रीय ग्रामीण विकास, पंचायती राज स्वच्छता एवं पेयजल मंत्री हैं. साल 2009 में तोमर मुरैना सीट से विजयी हुए थे और वो पहले राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं. साल 2008 में उन्हें संसद में उत्कृष्ट मंत्री के रूप में सम्मानित भी किया गया था.

कौन हैं अशोक सिंह

अशोक सिंह को दिगविजय सिंह का करीबी माना जाता है. पिछले तीन बार से कांग्रेस उन्हें लगातार ग्वालियर सीट से टिकट दे रही है लेकिन उनके हिस्से में हार ही आई है. हालांकि अशोक सिंह के नाम से पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्नी प्रियदर्शिनी राजे को टिकट देने की संभावना जताई जा रही थी.

ग्वालियर संसदीय क्षेत्र में आठ विधानसभा क्षेत्र हैं. ग्वालियर ग्रामीण, ग्वालियर, ग्वालियर पूर्व, ग्वालियर दक्षिण, भितरवार, डबरा, करेरा, और पोहरी. यहां की आठ विधानसभा सीटों में से 7 पर कांग्रेस और 1 पर बीजेपी का कब्जा है.
 

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