पंचतत्व के प्रतीक हैं, श्वान, कौवे, गाय, चीटियां और देव
ग्वालियर धार्मिक ग्रंथों व शास्त्रों में मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष में हमारे पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और आशीर्वाद देते हैं। पितरों का श्राद्ध करना सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। श्राद्ध पक्ष के दौरान पितर पशु पक्षी के माध्यम से हमारे करीब आते हैं। मान्यता है कि पितरों तक भोजन पहुंचाने के लिए चीटीं, कौवे, श्वान, गाय, व देव को भोजन कराया जाता है। यह भी मान्यता है कि यह पांचों पंचतत्व के प्रतीक भी हैं। ज्योतिषाचार्य सतीश सोनी के अनुसार पूर्णिमा तिथि से लेकर अश्विनी अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष रहता है। इन 16 दिनों में पंचवली का सबसे अधिक महत्व रहता है। पितृपक्ष में श्राद्ध व पिंडदान करने के बाद पंचवली करके ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। बालाजीधाम मंदिर में पितरों के तर्पण व शांति के लिए 11 सितंबर से 17 सितंबर तक पंचवली के साथ श्रीमद् भागवत कथा व गजेन्द्र मोक्ष पाठ के साथ विभिन्न आयोजन किए जाएंगे, जिसमें भाग लेकर जातक अपने पितरों की शांति के लिए यज्ञ आदि कर सकते हैं।
यह हैं पंचतत्व के प्रतीक
सनातन संस्कृति में श्वान को जल तत्व का प्रतीक माना जाता है। चीटियों को अग्नि, कौवे को वायुतत्व, गाय को पृथ्वी और देवताओं को आकाश का प्रतीक माना जाता है। इस तरह से हम पांचों को आहार देकर हम पंच तत्वों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। श्राद्ध पक्ष में गाय की सेवा को विशेष महत्व दिया जाता है।
पंचवली की विधि
पंचवली का एक भाग श्वानों को खिलाया जाता है। श्वान यमराज का पशु माना जाता है। श्राद्ध के भोजन का एक अंश देने से यमराज भी प्रसन्न होते हैं। शिवपुराण के अनुसार श्वान को भोजन देते हुए कहना चाहिए कि यमराज के मार्ग का अनुसरण करने वाले श्याम व सबल नाम के दो श्वान हैं। मैं उनके लिए यह भोजन का भाग देता हूं, वे इस बलि को ग्रहण करें। इसे कुकर बलि भी कहा जाता है। इसके साथ ही गाय के अंदर सभी देवताओं का वास धार्मिक ग्रंथों में बताया गया है। गाय को भोजन खिलाने से यह भोजन सीधा सभी देवताओं तक पहुंचता है।
कौवे को भोजन
पंचवली का एक भाग कौवे के लिए छत पर रखा जाता है। गरुण पुराण के अनुसार कौवा यम का प्रतीक है। जो दिशाओं को फलित करता है और यह शुभ, अशुभ संकेत बताने वाला होता है। कौवों को पितरों का स्वरूप भी माना जाता है। श्राद्ध का भोजन कौवों को खिलाने से पितृ प्रसन्न होते हैं।
देवदि वली
पत्ते पर देवताओं को भोजन देने के लिए पंचवली का एक भाग देवताओं को दिया जाता है। इसमें पूर्व दिशा की ओर मुंह करके गाय के गोबर के कंडे को जलाकर उसमें घी की आहुति देकर पांच निवाले अग्नि में डाले जाते हैं।
पीपलादवली
पीपल के पेड़ के आसपास काफी संख्या में चीटियां व अन्य कीड़े व छोटे–छोट जीव रहते हैं। पीपल के वृक्ष के नीचे पंचवली का एक हिस्सा रखने से इन सभी का पेट भरता है। जिसे पीपलादवली कहा जाता है। इसके बाद ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है।
